आज रो मिनख

लाद्‌यां फिरै

गाडो

दुखां रो।

मूंडै माथै

मरदानगी छायोड़ी

पण कठै कठै

उणरी

घात लाग्योड़ी।

आज रै मिनख नैं

नीं मिलै चैन

वो नित रैवै बैचैन

हरख है थोड़ो

पीड़ है घणी।

काळज्यै मांही

लाग्योड़ी है दाझ।

आज रै मिनख नैं

नीं है वगत

मिल बैठ’र

करण सारु

सुख-दुख री बातां

जिण सूं कम हुवै

गम, दुख अर दरद।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कृष्ण लाल बिस्नोई ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन, पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-19
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