फागण रो म्हीनों,

अबकै जाणै,

आयो हीज कोनी।

कोई ल्यावणो चायो हीज कोनी।

देखबानै तो

इबकाळै बी।

पाँच च्यार जाग्यां

डफ़ बाजता देख्यां,

पण जिकां नै सुण

सीरो पकड़ता कंठ,

सागै गाबां नै,

उठता पग नाचबा नै,

बिसो बाजणो चंग तो इबकै–

कोई बजायो हीज कोनी।

चतरै चमार बणायो हीज कोनी।

सिंझ्या रा

चूंतरां उपरां

फागण री अगवाणी करता,

बै मधुर गीत,

जाणै कितरा रूपाळा,

सपना सिरजता,

जिका सुणनै–

बैह ज्यांवतो आखो सरीर,

बरफ री डळी ज्यूं,

इस्योड़ो गीत–

कोई राधा,

कोई रुक्कण,

अबकै गायो हीज कोनी।

कोई गावणो चायो हीज कोनी।

घिनड़ घालबा रो

किसनै नै नीं चढ़ियो चाव।

मैरी बण नाचण रो,

फीको उछाव।

नीं आया होठां उपरां,

धमाळ रा बोल।

घूघरां रो नीं माच्यो,

इबकै रिमझोळ।

रसियो गायर

कोई इबकै

सुणायो हीज कोनी।

घूंघर अेक,

गरणायो हीज कोनी।

फागण रो म्हीनो..।

स्रोत
  • पोथी : हिवड़ै रो उजास ,
  • सिरजक : सांवर थावर ,
  • संपादक : श्रीलाल नथमल जोशी ,
  • प्रकाशक : शिक्षा विभाग राजस्थान के लिए उषा पब्लिशिंग हाउस, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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