सीतली रौ बडोड़ौ वीरौ उणनै लेवण नै आयौ हौ।

उणरी सासू उणनै लेय जावण सारू संदेसौ भेज्यौ हौ। उणरै पीहर में इण बात सूं चिंता हुई के सीतली नै ब्याव पछै नीठ अेक दो बार भेजण आळी उणरी सासू अब कालै खुद चलायनै उणनै लेय जावण रौ संदेसौ किंयां भिजवायौ? सीतली कोई माड़ी बात तो नीं करदी?

सीतली परसेवै में भीज्योड़ी रोटियां पोवण में लाग्योड़ी ही। उपराळै में मांचै माथै उणरौ वीरौ बैठ्यौ हौ। उणरी सासू धीमै सुर में उणसूं बातां करै ही। सीतली नै कीं नीं सुणीजै हौ, छतांपण वीरै मूंडै कानीं देख्यां उण माथै चिंता री छिंयां सुभट लखावै ही।

इतराक में सीतली रौ मोट्यार गोडां तांई चढ्योड़ी सूथण नै गेरा हाथां सूं झाल्यां आंगणै में आयौ। टंकी नेड़ै बैठ’र लोटौ मांजण लाग्यौ। वो अबार धोरां जायनै आयौ है। उणनै परदेस सूं आयां नै दस पनरेक दिन हुया हा।

सीतली रा पीहरवाळां नै इण बाता सूं घणी चंता हुई के जद कुंवरसा परदेस हा तद तो सीतली नै पीहर नीं भेजी। अर अबै ब्याव रै दो साल पछै घरां आया है तो उणनै लेय जावण रौ संदेसौ किंयां करवाय दियौ?

सीतली री सासू उणरै वीरै नै कह्यौ— ''बडोड़ी बीनणी नै आयां नै घणा दिन होयग्या, इण वास्तै इणनै तो कीं दिना वास्तै लेय जावौ पण छोटोड़ी बीनणी नै भेज देया।''

छोटोड़ी बीनणी सीतली री छोटी बैन इज ही। उणरौ ब्याव सागण सावै उणरै देवर सागै हुयौ हौ।

चूल्है में फूंक देवतां सीतली नै रोणो आयग्यौ। छेवट उण इसौ कांई कसूर कियौ जिकौ संदेसौ करवाय’र उणनै पीहर भेज रह्या है।

यूं पीहर जावण रौ मन किणरौ नीं होवै?

इण बात रै सागै सीतली नै आपरौ पीहर याद आय जावै। याद आय जावै बाखळ में ऊभौ वो नीमड़ौ, तावड़ै री लाय में, जिणरै माथै चढ’र वा अर रूखड़ी हथाई किया करती। हथाई री कोडाई सीतळी सगळौ काम घणौ बेगौ निवेड़ लेवती, बापू अर दोनूं भाई तो झांझरकै उठनै बाणियै रै उठै बुआ जावता। लारै सूं मां डांगरां नै दूहनै बुई जावती। बापू अर भाई बाणियां रै उठै हाळीचौ करता अर मां उण हवेली में इज रसोड़दारण ही।

उण टैम सगळै घर रौ खोरसौ सीतली माथै हौ। घर में उणरी छोटोड़ी बैन अर वा दोनूं जणियां होवती। सीतली रोटियां पोवण सूं लेय’र बिलोवणौ करण अर घी तपावण तांई रौ सगळौ काम ढबौढब कर लेवती। जद तांई रूखड़ी नीं आवती, गायां रा चींचड़ उपाड़ण में लागी रैवती। काम काज रै पछै नीमड़ै माथै चढ’र रूखड़ी सागै हथाई करण रै अलावा निकमौ रैवणौ आछौ नीं लागतौ।

रूखड़ी री मां कई बार उणरी मां नै कैयबौ करती—''बींनणी, थारी सीतली तो काम नै पाणी रै ज्यूं पीवै। म्हारी रूखड़ी तो बूट कोनीं बाढै। फेरूं निस्कारौ नांख’र कैवती—''पण डावड़ां, परायौ धन किताक दिन घर में घाल’र राखसौ?''

अर सीतली री मां रै मन में टीस सी उठ जावती। गांव रै हिसाब सूं सीतली खासी मोटी हुयगी ही। रूखड़ी रौ ब्याव होयनै मुकळावौ होयग्यौ हौ पण सीतली रै ब्याव रौ कठैई अतौ-पतौ नीं हौ।

तीन बरसां सूं लगौलग दुकाळ री स्थिति ही। सीतली रा माईत नीठ घर-डांगरां रौ धाकौ धिकावै हा।

सीतली री माँ कैवती—जेठाणी सा! अबै तो किंयां सोरा-दोरा होयनै सीतली नै धोरियै चाढणी है। कोई पुन्याई वाळौ आसी अर इणनै लेय जासी। सीतली तो लिछमी है।

इण भांत बात खतम हुय जावती। अेक दिन सीतली रौ संपत मामौ आयौ, वो बापू अर मां सूं रात नै मोड़ौ तांई बातचीत करतौ रह्यौ। झूंपै में चिमनी जागती रही।

अचाणचक सीतली रौ ब्याव मंडग्यौ, ब्याव मंड्यां पछै सीतली अर रूखड़ी नीमड़ै माथै चढ’र हथाई करबौ करती। रूखड़ी अेक दिन उणनै कह्यौ हौ—''सीतली म्हारी मां कैवै के छोरै में कीं कसर है, पण थारौ बापू इण खातर मानग्यौ के थारी छोटकी बैन केसर रौ ब्याव थारै देवर सागै होवणौ नक्की हुयौ है।''

—कसर कियां?

सीतली कसर रौ मतळब नीं समझी।

—कैवै आंख्यां घणी कमजोर है अर डील रौ अैन थाकल है।

—चोखौ है तो! सीतली नै लाज आयगी। अलबत मन में जाणण री जिज्ञासा रही। वा सोचण लागी के रूखड़ी नै लाज सरम नी आवै। छोरी री जात होयनै सगळी बातां बताय देवै...बेशरम!

फेरूं भोळी-ढाळी सीतली नै इतरी बात तो समझ में आयगी के उणरै बापू उणनै कसर आळै छोरै रै लारै घाल’र उणरी छोटोड़ी बैन केसरड़ी नै धोरियै चाढण री फांसी निकाळ ली है। तिण उपरांत दायजै री कोई दैण नीं। वे लोग संपत मामै रै शहर रा इज है। परदेस में कारबार है अर चोखौ घर है। सीतली मन में थोड़ी राजी होयनै बड़ावली हुवण लागगी। शहर री रहणी करणी री बातां सुणी ही, मन में घूमण लागगौ पक्कौघर...पक्कौ आंगणौ...अर बिजली पाणी रौ प्रबंध।

रूखड़ी रौ सासरौ तो गांव में इज है...वा फेरूं सोचण लागगी।

अर अेक दिन गांव में गाजां-बाजां रै सागै जान आई। जान रै ठाट-बाट री चरचा सीतली रै कानां तांई पूगी। बैंड-बाजा, पेंट-कोट पेहर्‌योड़ा जानी...सुण’र सीतली रै मन में गिलगिली सी होवण लागगी।... ऊंह! रूखड़ी री जान तो छकड़ां में आई ही अर झूंपां में उतरी ही। उणरौ बापू तो बाणियां रौ मानीतौ आदमी है...जान मोटर में आई है अर हवेली में उतरी है।

सीतली री छाती बड़ाई सूं फूलण लागी पण वा देख नीं सकी जाय’र...अरे वो...! सीतली नै फेरूं लाज आयगी।

पण रूखड़ी मायनै बताय दियौ—सीतली री लाज उणरै मन माथै इतरी भारी पड़गी के उणमें उणरौ सोच्योड़ौ सरूप सामी नीं आय सक्यौ।

ब्याव होयग्यौ।

जात भात जीमण नै आई तो सीतली झूंपड़ै रै ओळै सूं बाखळ में जीमती जान नै देखी।

रूखड़ी ठीक कैवती ही—बडोड़ौ बींद काळौ स्याह, डील में थाकल अर आंख्यां माथै जाडै काच रौ चस्मौ पेरह्योड़ौ हौ। केसरकी रौ बींद सावळौ पण भरवैं डील रौ अर नाक नक्श सूं फूटरौ हौ।

सीतली कदैई चस्मौ पेहर्‌योड़ौ बींद नीं देख्यौ हौ। उणनै देख’र अचूंभौ सो हुयौ।

सीतली जद मोटर चढ’र सासरै वहीर हुई तो रूखड़ी उणनै सुहागरात बाबत मोकळी बातां बताई—देख ईयां करजै, विंयां करजै, रुपिया देवै तद मूंडौ दिखाईजै। सीतली लाज सूं दोवड़ी होवती रही। उणरै सागै केसरड़ी पणही। सात-आठ बरस री केसरड़ी घूंघटौ काढ’र खाथी-खाथी चालती जद मोटर में चढण लागी तो सगळा जानी ही-ही करनै हंसण लागग्या।

सीतली सासरै पूगगी।

सासरै में सगळी लुगाइयां-छोरियां बारी-बारी सूं उणरौ मूंडौ देख्यौ अर थूथकौ नांखतां कह्यौ—वाह बाई वाह! बींनणी तो गवर जिसी फूटरी लाया।

ब्याव रौ घर हौ सो सगळां सूता जितरै खांसौ मोड़ौ होयग्यौ। सीतली कर केसरड़ी नै ओसरी में सुवाण दी। केसरड़ी नै तो बेगी नींद आयगी। सीतली नै घणी लाज आवै ही अर मन में अजाण्यौ सो डर समायोड़ौ हौ। उणनै नींद नीं आई।

बिचाळै-बिचाळै रूखड़ी री बतायोड़ी बातां उणनै चेतै आय जावती अर वा अेकली बैठी लाजां मरण लाग जावती। उणरी नणदां बंतळावण री घणी कोशिश करी पण वा गूंगी-मूंगी बैठी रही।

धीरै-धीरै सीवौ पड़ण लागग्यौ।

—चालौ भौजाई सा! उणरी नणद आय’र उणनै उठण रौ कह्यौ। सीतली री छाती धड़कण लागी। केसरड़ी इण सगळै माहौल में डरूं-फरूं हुयगी ही अर रोवण लागगी ही। इण कारण सीतली उणनै आपरै खोळै में सुवाण राखी ही। जोर-जत्ता में सीतली नै उठणौ पड़्यौ।

पण जियांई वा उठी, केसरड़ी री आंख खुलगी। असैंधी लुगाइयां रै सागै आपरी बैन नै जावती देख’र वा घबरायनै रोवण लागगी बाई थूं सिध जावै?

सीतली री नणदां हंसण लागगी, सीतली री हालत कमरै में रोडियोड़ै कबूतर रै जिसी होयगी। नणदां आपरी नैनकड़ी भावज नै लडावण में लागगी पण वा मानी कोनीं। वा तो आपरी बाई रौ हिडौ करनै जोर-जोर सूं रोवण लागगी। काठी जिद पकड़ली के म्हैं तो बाई रै कनै सोयसूं।

बारै बाखळ में सूता आदमियां रै कानां में रोळा-रप्पौ पूगौ। उणां चिड़’र कह्यौ—अरे, रोवै कुण है?

—कोई कोनी काकौजी! सीतली री नणद उत्तर दियौ। पण छेवट केसरड़ी री जीत हुई। सीतली रात भर उणनै खोळै में लियां बैठी रही।

दिनूंगै घर में फैसलौ हुयौ के कालै शनिवार है सो बींनणी नै आज पाछी भेजदां।

इणरै पछै दूजी वार सीतली सासरै आई तद तांई उणरौ सायबौ आसाम कमावण नै पूगग्यौ हौ।

केसरड़ी नै टाबर जाण’र पीहर में छोड़ दीनी। पण सीतली इण दो बरसां में अेक दो हफ्तां नै छोड’र घणकरी सासरै रही। अेकर वा आठ महीनां सूं पीहर गई तद रूखड़ी आपरै सासरै गयोड़ी ही। इण कारण उणसूं हथाई नीं हुय सकी।

अबै सीतली रौ मोट्यार दो बरस री मुसाफरी पूरी करनै पाछौ देस आयग्यौ हौ। उणरै कोई पेट री बिमारी लागगी ही सो इलाज तांई देस आयौ हौ।

उठौ जावौ! बींनणी त्यार हुय जावौ। थांरा भाई थांनै लेवण नै आयौ है। सीतली घूंघटौ काढ्यां आटै सूं हाथ झाड़ती बैठी हुयगी।

उणरी समझ में कीं बात नीं आई।

कपड़ा-लता सांभण खातर कमरै में जावतां उणै घूंघटै में सूं देख्यौ तो उणरौ मोट्यार नाक रै सळां माथै चस्मौ ठैरायां आपरै साळै कनै नीची धूण घाल्यां चुपचाप बैठौ हौ।

उणनै इण भांत ऊभघड़ी पीहर रवानै करण री बात कीं समझ में नीं आई। अबै वा पूछै भी तो किणनै?

उणरै सासरै रै अड़ौअड़ उणरै बडोड़ै सुसरै रौ मकान हो। उण घर री सरीखी सांइनी बीनणियां सागै उणरी उठक-बैठक ही, हेत-प्रेम हौ।

सीतली आपरै सासरै में तन काट’र खोरसौ कियौ हौ। इण कारण सासरै री गळी गवाड़ी में वा सैंणी अर कामगरी बाजै। लुगाइयां परपूठी उणरा वखाण करै। उणरी बडोड़ी सासू तो आपरी बहूवां नै बार-बार मौसा देवती कैयबौ करै—धरंमियै री बीनणी जाणै काम रे पेट में सूं जनम्योड़ी है!...कितरौ काम करै! ...अर थै? थांरी मांवां थांनै कीं सिखायौ आथ कोनीं?

बस फगत अेक ठाडौ आत्मसंतोष सीतली रै पल्लें बंध्योड़ौ हौ।

बड़ै सुसरै घरां आपरी जेठाणी रै कनै पूगतां-पूगतां सीतली री आंख्यां में आंसूवां री झड़ी लागगी। जेठाणी उण री मनमेळू ही। वा दुख-सुख री बात उण आगळ करती उण कनै पूग्यां उणरै धीरप रौ बांध फूटग्यौ। वा रोवती-रोवती बोली—जेठाणीजी म्हैं इसौ कांई कसूर कियौ है?...थांरै देवरजी नै आया नै पनरै दिन हुया है अर म्हनै संदेसौ करवाय’र पीहर क्यूं पुगावै?

—थारै अर धरमजी रै बिचाळै कोई बोलचाल तो नीं हुई? जेठाणी उणनै धीरप बंधावतां पूछ्यौ।

—वे?...सीतली रे चेहरै माथै दुख रौ समंदर लेहरां लेवण लाग्यौ।

—वे तो आयां पछै म्हासूं बोल्या नीं है। बस जागता होवै जित्ती ताळ भींतां कानी देखता बीड़ियां फूंकता रैवै अर पछै... अपूठा फिर नै बोलाबोला सूय जावै। सीतली अेकर चुप हुयगी। बात कैय’र उणै जाणै अणूंतौ भार उपाड़ लियौ, उणरी नाड़ नीची हुयगी।

नारी रै मन री पीड़ा नारी समझ सकै।

जेठाणी उणरौ मूंडौ ऊंचौ करनै निजरां मिळाई तो सीतली बोदै कपड़ै री दाई जरड़ करती फाटगी...! हथलेवै रौ दोष मान म्हारी बैन! दो बरस बीतग्या...म्हैं ओजूं कुंवारी हूं...अकन कुंवारी।

जेठाणी सुण’र भाठै री मूरत बणगी।

सीतली नै उठै आपरी छाती रै चेप लीवी। वा खासी ताळ रोवती रही।

—रोव मत सीता!...थूं जाणै जिसी बात नीं हुय सकै। धरमजी रौ शरीर बिमारी रै कारण ठीक कोनीं। वे म्हनै कैवै हा के म्है दस पनरेक दिन दवाई लेसूं...वे निरोगा हुयां म्हैं वांनै पनरेक दिनां बाद भेज देसूं।...थूं धीरप राख...जीव छोटौ मत कर।

सीतली आपरै पीहर पूगगी।

उणरै भोळै मन में जेठाणी री बात सूं थोड़ौ थावस बाधौ। वा पनरै दिन बीत्यां उडीक करण लागी। आपरी मां नै उणै कैय दियौ के पनरै दिनां बाद उणनै लेवण नै आय जासी।

पण सीतली री उडीक, उडीक बणनै इज रैयगी।

छेवट अेक दिन उणरौ संपत मामौ उणरै सासरै रा समाचार लेयनै आयौ!... आपणै कुंवरसा रै बाबूजी रौ तार आयौ हौ सो वे तो आसाम पधारग्या है।

सीतली सुण्यौ अर सुण’र सुन्न हुयगी।

उणनै लखायौ के परिस्थितियां उणनै जेवड़ीं री दाई बट नै मेल दीवी है। उणनै ठा नीं पड़ी के कद उणरा दांत काठा भींचीजग्या। वा आंगणै में मांचली माथै मर्‌यौड़ी सी पड़गी। संपत मामौ उणरी मां नै कैवै हौ—सीतली री सासू कैवायौ है के बडोड़ी बींनणी नै अबार अठै भेज देया। आवै खेती रै मौसम में उणनै पाछी पुगाय’र छोटोड़ी नै लेय जास्यां।

सीतली भड़ाक सी उठगी।

वा छेड़्योड़ी नागण रै ज्यूं फूंफाड़ा करती आपरी मां अर मामै कनै जाय’र कैवण लागी—सासू नै जाय नै कैय दीजौ मामौजी के रोटी साटै हालीचौ करूंली तो म्हारै पीहर में कर लेसूं...म्हैं सासरै कोई आज जावूं कोई काल जावूं।

—सीतली! फैम राख। मां बोली।

—फैम घणौ राख लियौ मा! दो बरसां तांई राख लियौ।...अबै साफ सुणलै मा! थूं राखसी तो थारै आगै आखी उमर काढ देसूं...नीं तो राम रुखाळौ है!...पण बीं सासू रै जायोड़ै माटी रै पिंड रौ सुहाग लेयनै अबै हालीचौ नीं करूंली...कदैई नीं करूंली।

उणरी मा अर मामौ उणरै कानी आंख्यां फाड़ फाड़’र देखै हा अर सीतली रै मांय सूं जाणै अगन झळां उफणै ही।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : मालचंद तिवाड़ी ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : मई 987
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