(1)
चन्दूलाल हाईस्कूलरी दसवीं किलास में पढ़र्या है। बाप तीन बरसांरी लटनै छोड’र परलोक सिधार गयो हो। मा लायण बडियां-पापड़ वट’र घणों दोरो बैनै इत्तो बडो कियो। आज बै सतरवों साल पूरो कर’र अठारवै में पग धरियो है।
चन्दूलाल रै दो काका हा पण बां-रै-ई लाई-खाई ही। बैरी मा री मदत करण जोगो कोई को हो नही। तीनूं घरां-मे बो एक ई तुरक रो दांतण, घररी जाज, घररी टेवकी हो।
बो मा-नै तो हीमत बंधावतो ई हो कै एक बरस छेडै हूं नोकरी लाग जाऊंला पछै थांनै क्यों पापड़-वड़ी-सूं माथो लगावणो पड़ैला। पण आपरै दोयां काकांरो-ई जी जमाय देंवतो हो कै क्यों सीदावो हो, हूं कमावण लागोनी के आपारै रोटीरो सांसो भागोनी। छोरो सैणो-सपूत अर थुथकारो नाखण जिसो हो।
मा रै खनै कंई रूग्घो-चुग्घो हो जिको दाड़ी रै औसर बापरै किरिया-करम अर चन्दू-री जिन्दोई में लेखै लाग चुको हो’ खनै बंची ही नव नारायणरी देह जिकै सूं मैनत-मजूरी करो तो टुकड़ो खावो। चन्दूरै ननाणैवाळांरो ई गाडो दोरो-सोरो गुड़कतो हो। ट्रंकै में, कठै ई सूं तांबेरै पइसै रो-ई सायरो को होनी।
चन्दू रै घर रै खनै एक बाळ-सभा ही। रात नै बो बठै पढण जातो परो कारण घणी वेळा घर में तेल रो ई डौळ को हुतो कोनी। पढाईरी पोथ्यां, छोरां री गरज कर’र, बो मांग-तांग’र ले आतो। गाभां रो ओ हाल हो कै एक खादी रै चोळै अर धोती नै महीनां तांई चलाय लेवतो। पण सऊरवाळो इसो हो कै कदै ई मैलो गिन्दो को दीखतो हो नीं। सदा चोळे’र धोती नै धौळा-धफ्फ राखतो। मदरसै सूं घरै आंवते-ई पंछियो पैर, धोती है पटल्यां घाल’र चोळै नै झड़काय’र दोयां नै खूंटी ऊपर टांग देतो।
गळी में, मांदां-तातां-री, चन्दू चेष्टा राख’र दवाई लाय देवतो। कई रो भोळायो काम कर देवतो। बूढे-ठेरै रै घर में पाणी नहीं हुतो तो फट्ट-ई नळ सूं घड़ो भर लातो। कई रै चौवटे-सूं दौड’र साग लाय देवतो। सगळां रै मूंडै लागणो हो अर आंख में घालियो-ई को रड़कतो हो नीं।
चन्दू री मा-री धाप’र चेष्टा ही कै चन्दू वेगो परणीजै। पण छोरी ढूकती को हीनी, गरीब नै कुण देवै। नित-नित थांरी-म्हांरी हिड़क्यां रै हाथ लगावतै-लगावतै छेकड़ एक जागा पाढो ढूको।
चन्दू, ब्याव री चरचा सूं मांय-ई-मांय दुखी होय जावतो। वो सोचतो हणै-ई घर री आ दसा है, एक जीव वधण सूं फेर खरचो वध-ई सी। कठै-सूं गैणा-कपड़ा आसी। कठै सूं भाईपैवाळा जीमसी। जमा-जंत में तो एक टापरियो है जिको भलांई अडाणै धर दो। पण रकम-रो ब्याज-ई तो लागसी। कठै सूं देसां। हूं संभसूं तो हाल दो वरसां-नै। इत्तै करजै रो कोट चिणीज जासी।
मा रै सामनै, कदै-ई, चन्दू ढैई-कैई वातां करतो जद बा कैती-बेटा। हीमत राखो, ठाकुरजी सगळी ठीक करसी ‘जिण घर बाळा, उण घर कांय-रा देवाळा’।
(2)
किसनू रै घर में भूवाजी फिरियोड़ी ही। लाई, लाई-खाई करतो हो। भाग सूं संभाऊ आंख्यां दूखणी आयी। सेठां-रै बेटै-रो-ब्याव हो। दूखती आंख्यां गरमी-तावड़े में भटकणों पड़ियो। धूंवै-फूंकै-में बैठणो पड़ियो।
सैणी लुगायां खनै मिसरी अर फूल-काजळ घलायो। पण आंख्या बिगड़ती गयी। जी रो उकाळियो अस्पताळ नाठो। उठै गरीबां री सुणाई कठै-ही। दीयां-लीयां बिना कुण परवा करतो हो। कैनै हाय बिना दाय ही। अस्पताळ आळां पैलां मामूली दवा घाल’र टरकाय दियो। पछै छणी गरज अर हाथाजोड़ी करी जद भरती होवण रो कयो। किसनू रै आंख्यां आगै अडचण रो चित्तर मंडग्यो। कुण कोस भर आसी। कुण रोटी पूगासी। कठै-सूं घी-चोपड़’र दूध लासूं। आंख्या दूखतां नै महीनो-मास हुयग्यो, सेठजी काम काढ’र ऊतर दे दियो, घर में कुणको ई कोयनी, बापड़ी छोरी जमनूड़ी पोटा चुग’र लावै, कंई बाळांर कंई बेचां, छोरी सूं लायण-सूं कांकर ताबै आसी, कठै खुड़िया खुचरती आसी। गोपै कैयो हो, हूं डागदरजी नै कै-सुणंर, अस्पताळ सूं ईज रोटी अर दूध रो मुफ्त में बंदोबस्त कराय देसूं। लायण छोरी तीन-चार वार फिरी पण गोपो किसो आय’र मूंडोई देखाय जाय। सुधारक वणियो फिरै है अर वात री सनतई कोयनी। बीजो कोई सैंधो कोयनी। कैनै हाय बिना दाय।
बै थावस करली कै अस्पताळ रो औसाण आवै कोयनी। घर री दवा कार को करी नीं। आंख्यां में बटीड़ा मारण लागा। थे-म्हे पूछण जावै पण मदत कोई नहीं करै। इत्तोई नहीं कै रात-विरात रो संभाळ तो लेवै। छोरी लायण फाई-फीटी हुयगी। किसनू-री मामै री बेटी कदै-कदै आय जावती। पण किसनू रै सुख री जागा दुख घणो हुय जावतो। वैरा टाबर-टूबर धमचक मचावता अर बैनै जिकर सुवावतो कोयनी। टाबरां नै दुपारो-सिरावण ई जोयीजतो, अठीनै घर में ऊंदरा थिड़्या करता हा।
गळी में नित-नेम अर भजन-पूजन करणिया मोकळा हा। गीता रो पाठ होवतो। आतमा परमातमा अेक है री चरचा चालती। रामायण वांचीजती। सगळा पूछण आंवता पण टुणटुणी वजाय’र टरकन्त। ग्यान-रा आईठाण हुयोड़ा हा। परायै दुख में पड़णै री चेतना होती ई को होनी। खाली मूंडै री लपालपी ही।
किसनू घणो-ई भैरूंजी रै परसाद सुखियो, मांवड़ियाजी रै आखा भेजिया, डाकोतियै खनै गिरै, गोचर देखाया अर छनीछरजी रो दान कियो पण आंख्या रां पट्ट मिळई गया। अबै लाई भीतां टंटोळण जिसो हुयग्यो। धीरै-धीरै लकड़ी रै सायरै फिरण-टुरण लागो।
खनै तो अखत-रा बीजई नीं। अठीनै छोरी परणावण सावै हुयगी। कंई घुड़कै सूं अर कंई थेपड़ियां सूं उदर-पूरणा करै।
जमनूड़ी-री साईन्यां से परणीजगी। छोरियां भेळी हुवै ‘जणै बैनै कैवे- ‘थारो बाप तनै कद परणासी ए जमनूड़ी! अबै तूं छोरी थोड़ै-ई है। देख। ऊभी हो, खांघो माप, म्हां-सू तो चार आंगळ डीघी है।
कोई चतराई-सूं किसनू नै छोरी नै परणावण रो इसारो करतो तो कोई फूड़ पाधरोई, पत्थर सिरकाय देवतो कै छोरी घोड़-री घोड़ हुयगी अबै किताक दिन कुंआरी राखसो।
चन्दू री मा-नै खड़क लागी। बै मांगा तांगा करणा सरू किया। किसनू है मामै रै बेटे री गरज करी। किसनूई छोरैरी सोभा सुणी। आप जिसोई सगौ मिलणै सूं कुंई जी में जची। अठीनै-उठीनै री नित री कैवा-सुणी सूं, आखर एक चोखै दिन हांकारो भर लियो।
चन्दूरी मां रै अबै हरख रो पार नीं। अठीनै किसनू री ई चिन्ता कुंई कमती हुई।
पण दोनूं घरां री भूवाजी भेळी होय’र दोनूं सगां नै सपनै में नित रा दरसण देणा सरू कर दिया।
(3)
किसनू रै नानैजी रै सेठां रै घर में पोतै-री बधाई हुई। किसनूं रै मामै री बेटी रो उठै जावणो आवणो हो। बै मौको देख’र सेठ-सेठाणीजी नै किसनू री हकीगत कयी। कयो-ओसवाळ भोपाळ वाजै है; छोरी-रा हाथ पीळा करवाय दो तो किन्या-दान रो फळ मिळसी; किसनू बापड़ो आंधो है। सेठ भला हा अर गरीबां रै वास्तै जी में थोड़ी जागां ही। ब्याव है सागै-सागै, किसनू रै रोटी-पाणी रो जुगाड़ ई सदा रै वास्तै कर दियो।
इण तरै किसनू रो काम तो पार लंघियो। चन्दू री मा खनै टापरो हो जिको अडाणै राख’ ब्याव-री जुगत बैठायी।
(4)
अखातीज-रा सावा। ऐकम सूं-ई वीन नै भाभड़ाभूत ताव। आंख-ई खौलै नहीं। रंग में भंग होवण लागो। दोनूं घरां में हरख अर चिंता सागै-सागै वड़ण-निकळण लागी। चन्दू री गळी, गुवाड़वाळा एक पग तणां ऊभा। कदै-ई कोई वैद लावै तौ कदै-ई कोई डागदर। बीज नै तबियत विसेस खराब होवण लागी। छोरो सैणो हो, साफ-साफ सगळां रै सामने कैय दीयो, मनै अबार मत परणावो। म्हारै जी सूं झगड़ो लाग रयो है। पण बानै चढ़ियोड़ो वीन रूकै कांकर, अठीनै चन्दू री मा री धाप’र चेष्टा कै कांकर-ई फेरा खुवाय देणा। डागदरां री मुट्यां गरम होवण लागी।
तीज रो गोधळूक सावो। डागदर इनजैक्सन दैणा सरू किया। थोड़ो चेतो हुयो। सूरज मेळ बैठण लागो। डागदर फेर इनजेक्सन दियो। चन्दू बोलियो- ‘म्हारो जी लैबरीज रयो है, प्राण-निकळ जासी, मनै फेरा मत खुवावो, बापड़ी छोरी रा भाग फूट... ओय रे! जी डूबै है
मा कयो-चुपको है। चन्दू रोय’र कयो अरे जी डूबै है रे! फेरा मत खुवावो रे!! पण सुणतो कुण हो। दो जणां सायरो देय’र ऊभो कियो। परणावण री विधि बेगी-बेगी होवण लागी। चन्दू रो हाथ पकड़’र धींगाणै संकळप भरायो। पाछो-ई बै नै गोदी में उठाय’र सुवाण दियो। डागदर फेर इनजैक्सन दीयो अर घरै गयो। चन्दू रात भर तड़फियो अर बोलियो-अरे ना फेरा दो रे! अरे छोरी रा भाग फू...ट... ओय... जी जाय रे!
झांझर कै चिंद विगड़ण लागा। दम उठ ग्यो। नाड़ हाथ लागै नी।
आंख्या घोळ घालण लागी। डागदर-वैद हाथ झड़काय दिया। सगळा दुख-चिन्ता अर घबरावट में डूब गया। मा अचेत हो’र पड़गी। भाख फाटी। हंसा उड ग्या, घररी जाज डूबगी, टेवकी टूटगी! घर में कळझळ मचगी!! सारै सै’र में त्राय फूटगी!!!
(5)
सै’र में उदासी छायगी। दो जणा भेळा हुवै जठै आ एक-ईज चरचा। येक इणी तरै चरचा चाळती वेळा, गोविंद दुखी होय’र बोलियो-बापड़ी छोरी काळीधार डूबगी। हथलेवै-रो पाप लागो। बाप आंधो अर सासरै पीरै दोनू घरां में कसाळो।
गोपाळ पूछियो-छोरी री क्या औस्था है?
‘इग्यारै वरसां री।”
“बापड़ी नै हथलेवै रो पाप लागो, इयै धणी-रो क्या देखियो।”
“छोरै तो घड़ी-घड़ी कयो बतावै कै फेरा मत देवो।”
“तो मना करतै-करतै-ई क्यों फेरा देय दिया? छौरै री इच्छा को ही नीं जणै वियां कांय रा?”
“वियां तो हुया-ई मानीजसी।”
“धींगाणै फेरा दराया तो-ई वियां हुयग्या?”
“धरम तो आ-ई कैवै है।”
“धरम में तो नींवत देखीजै है।”
“म्हे तो कैवां हां छोरी रा ब्याव दूसर होवणा जोयीजै।”
‘परणीजियोड़ी कदैई आगै-ही फेर परणीजी ही?’
‘थे तो आरिया-पंथ रा हो क।”
“हाल तांई तो छोरी रै पीरैवाळा-ई बैठक को राखी नी? कुंई इसी आमना दीखै है कै फेर वियां करण सूं बै मांय-मांय राजी है। पण पिरगट-में कैता डरै है।”
“तो करो नी हीमत, आज ई हालो नी समाज रै कई जणां-नै सागै लेयर?”
“आ छोरी अखत जोणी है, ब्याव में धरम सूं-ई कुंई दोस कोयनी।”
“अरे! छोरो-छोरी मन में भावना कर लेवै तो-ई परणीजियै दाई मानीज जावै, गैला! सनातम धरम है, समझियो? हंसी-ठठा को है नीं।”
“थे आरिया-पंथवाळा तो धरम नै डूबावणवाळा-ईज हो’क?”
“पण काचा जापा! छोरै तो मनाई कर दीनी हींक?”
“आ छोरी किसी चावती ही कै धणी इसो मांदो होवै तो-ई फेरा खाय लेवै?”
‘इयै नै बकण दो, आघड़ो-ई। लागै जिकै-रे पीड़ हुवै है।”
“छोरी रो जमारो बिगड़ जासी?”
मिनखां री भीड़ वधती गयी। छोरी रै बाप रै घरै जावण री वात ते कर-ई रया हा इत्तै-में-ही तो मदन आयर कयो-काल रामचन्दजी थांसूं पैला-ई पूग ग्या अर घरवाळां नै समझाय आया कै बैठक-पोंतियो राखो। आ-ई कयी कै बीजा व्यांव करण री बात अधरम है। इसी बात करोला तो न्यात-जात सूं जावोला परा।
“बां रामचन्दजी-री वात मान ली क्या?”
“क्या करता बापड़ा गरीब?”
“रामचन्दजी आया घणा-ई धरम री धजा हजारां रूपिया पाठसाळा है नांव-सूं चंदो कर’र लाय’र गिटण्या अर डकार-ई को लीनी।”
“हूं तो कैवूं हूं आपां नै हालणो जोयीजै अर जोर लगावणो जोयीजै?”
“अबै हालो भलां-ई, कुंई भदरक को रैयो नीं।”
“भाईजी! छोरी रो जमारो विगड़ जावैला भला?”
‘तो ठाकुरजी रै आगै कैई रो जोर चालै है क्या?”
‘तो कोई परणीजियोड़ी-ई परणीजै है क्या? धरम डूब को जावैनी?’
“थांनै धरम री टांग पूंछ री तो ठा-ई कोयनी, पराया घर ऊनै पाणी सूं बाळता फिरो हो।”
“तो थे कराय दिया विधवा-वियां? हूं-ई देखूंला?”
“अरे! छोरी नै खाली हथलेवै रो-ई पाप लागो है। बाकी वै धणी रो क्या देखियो है। अरे थांरै कालजै री जागा भाटो धरियोड़ो है क्या?”
“हालो-हालो, क्यों लड़ो हो? मूंडै जित्ती-ई वातां।”
“वात आ है कै अबै मौको चूक ग्यो।”
भीड़ अेक-अेक कर खिंडगी।