आखौ राजस्थान ई सरस्वती रौ छेत्र रैयौ है

 

पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर। सरस्वती रा लाडला बेटा! जिणां रौ 3 अप्रैल नै सिंगापूर में स्वर्गवास हुयग्यौ।

 

भारतीय संस्कृति रा अेकनिष्ठ  आराधक अर उन्नायक डॉ वाकणकर प्राचीन भारतीय इतिहास रै अणजाण्यै सोनल पानां में आपरै सोध, सर्वेक्षण, उत्खनन अर अभिलेख-पठन इत्याद री मारफत दुनिया रै सामी प्रस्तुत कर’र अेक कानी मां भारती रै गौरव में बधापौ कर्‌यौ हौ तो दूजी कानी फ्रांस, इंगलैंड, मैक्सिको, अमेरिका इत्याद अनेकूं देशां में पुरातत्वीय उत्खनन अर शोधकार्य इत्याद कर’र दुनिया रै महान पुरातत्वविदां में आपरौ खास स्थान बणायौ हौ। उणां री बहुमुखी प्रतिभा में चित्रकला, मुद्रा-संकलन, सोध-प्रस्तुतियां, अभिलेखां री खोज अर उणां रौ पठन इत्याद मुख्य अर महत्वपूरण ही। अमेरिका, मैक्सिको इत्याद में कर्‌या गया उणां रा पुरातात्विक अन्वेषण भारतीय इतिहास नै ई नवी दीठ, नवौ चिंतन अर गौरव प्रदान करावण वाळौ है।

 

आपां रौ प्रदेश राजस्थान ई उणां रौ खास ऋणी रैयौ। वे बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर इत्याद छेत्रां मांय पाषाण काळ रै मानवां रा औजार, भींतीचित्र इत्याद खोज निकळ्या हा। वे चूंदी, वैसाली (जैसलमेर) देवका, किराडू, जूना, खेड़, तिलवाड़ै, सिवाणै, जाळौर, भीनमाळ इत्याद रै खंडहरां में गुप्त-मौर्य काळ अर उणसूं ई पैली री वास्तुकला रा तथ्य ई चवड़ै लाया।

 

‘सरस्वती नदी शोध अभियान’ रै त्हैत वे इण छेत्र में चौफेर घूम-फिर’र हनुमानगढ, गंगानगर, बीकानेर सूं फळौदी, पोकरण, खेड़, तिलवाड़ै सूं कच्छ तांई रै संपूरण हम्सै में सरस्वती अर उणरी सहायक नदियां रौ प्रमाण भेळा कर’र इण छेत्र रै इतिहास नै मानव-सभ्यता रै परभात काळ सूं जोड़ दियौ हौ।

 

अैड़ै महान व्यक्तित्व अर कृतित्व वाळै चगचावै विद्वान रौ अभिनंदन करण रौ जम जोधपुर नै ई है। लारलै बरस, 5 मार्च 1987 नै डॉ. वाकणकर रौ जोधपुर मांय नागरिक अभिनंदन कर्‌यौ गयौ। उणी कै उणां सूं अेक इंटरव्यू ‘माणक’ सारू लियौ गयौ हौ, पण किणी वजै सूं हाल तांई दिरीज नीं सक्यौ हौ। अबै पाठकां रै सामी वो ई इंटरव्यू पेस है—

 

जुगल परिहार : आपां रै देश में, प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरां रै रख-रखाव अर उणां री सुरक्षा री जकी व्यवस्था है, उण बारै में आपरा ई विचार है? कांई आप मौजूदा व्यवस्था सूं संतुष्ट हौ?

 

विष्णु श्रीधर वाकणकर :  अैड़ौ है क आपर अठै जकी जनता है, उणनै आपरी परंपरावां रै बारै में कोई खास जाणकारी है। आ ई वजै है वा आपरी प्राचीन धरोहरां रै प्रति अणमणी है, सो आज सै सूं बड़ी जरूरत तो आ है क आं प्राचीन धरोहरां रै प्रति उणां रौ लगाव पैदा कर्‌यौ जावै।

 

उदाहरण रै वास्तै म्हैं बतावूं—यूरोप में जे कोई अैतिहासिक वस्तु है, भलां ई वा घणी पुराणी ई मत हुवौ, 100-200 बरसां पुराणी ई हुवौ, जियां कोई टीबो के परकोटौ है, तो उणरी कानी लोगां रौ ध्यान आकर्षिण करण सारू उठै हर भांत सूं जतन कर्‌या जावै। भांत-भांत सूं प्रचार कर्‌या जावै।  उणरी रंगीन फोटुवां खिंचवा’र पत्र-पत्रिकावां में छपवाया जावै। जगै-जगै उणरा पोस्टर लगाया जावै। लोगां री सुविधा सारू उण अैतिहासिक स्थळ कनै बगीचौ तकात लगायौ जावै। साथै-ई-साथै उठै टेंट लगा’र रैवण री व्यवस्था ई करीजै। इणरै अलावा ‘म्यूनिसिपैलिटि’ में अेक अैड़ो ‘ब्यूरो’ ई खोल्यौ जावै, जठै उणरै बारै में हर भांत री जाणकारी उपलब्ध रैवै। अैड़ी व्यवस्थावां आपां रै अठै नीं हुवै। आ ई वजै है क अठै री जनता नै आपरी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरां रौ महत्व ई मालूम नीं हुवै।

 

अबै अेक उदाहरण म्हैं आपरै जोधपुर रौ ई देवूं, अठै अेक दरवाजौ है, नजीक ई...

 

जुगल परिहार :   जालौरी गेट!

 

विष्णु श्रीधर वाकणकर : हां, तो जालौरी गेट अेक प्राचीन वस्तु है। उणनै सम्मान रै साथै राखणौ चाइजै। पण अैड़ौ है ई नीं। उण माथै बडा-बडा बोर्ड, इण कमरै जित्ता बडा बोर्ड, परिवार-नियोजन रा लगायोड़ा है। म्हैं तो कैवूं—आं बोर्डा नै तोड़ न्हाकणा चाइजै, बाळ न्हाकणा चाइजै। क्यूंक उण ‘मोन्युमेंट’ माथै परिवार-नियोजन रौ बोर्ड लगाबण री कांई जरूरत है! वो ‘मोन्युमेंट’ तो देखण री वस्तु है। दीखण में आवणौ चाइजै। अबै जो कोई बारलौ पर्यटक आवैला तो वो दरवाजौ देखैला के परिवार नियोजन रौ बोर्ड!

 

जिण वस्तुवां री मारफत आपां लोगां नै आकर्षित करण रौ ढंग ई आवणौ चाइजै, जिणसूं क बारै सूं आवण वाळा पर्यटक ई देखै क हां, अे ई ‘मोन्युमेंट’ राखै। यूरोप में जावौला तो आप उठै देखौला क किणी ई ‘चर्च’ रै आखती-पाखती विज्ञापन रौ अेक ई बोर्ड नी लाग्यौड़ौ है। ‘चर्च’ रौ जित्तौ अेरियौ  है, उण में कठैई कोई बोर्ड निंगै नीं आवैला। पण आपां रै अठै देखौ, जठीनै ई निजरां जावैला, बोर्ड-ई-बोर्ड लाग्योड़ा निंगै आवैला। अबै आपरै जोधपुर में ई देखौ, जगै-जगै ‘जय गुरुदेव’ लिख्योड़ौ निजर आवै।  अठै तांई के भाखरां तकात माथै ई। इणा सूं नी सिरफ प्राचीन वस्तुवां रौ आकर्षण ई खतम हुवै, बल्कै उणां नै हाण ई पुगै।

 

तो लोग अैड़ी बाता अग्यान री वजै सूं करिया करै। इण अग्यान नै दूर करण सारू उण नै ट्रैनिग देवण री जरूरत है। अर इस्कूला में तो इण बाबत ट्रैनिंग जरूर दिरीजणी चाइजै। जियां क इस्कूलां रै छात्रां नै बरोबर अैतिहासिक स्थळां माथै ले जावणौ चाइजै अर उणां नै उण चीजां रौ महत्व बतावणौ चाइजै। उणां में उणां री सुरक्षा री भावना जगावणी चाइजै।

 

आ जकी ‘अेप्रिशियेशन ऑफ आर्ट’ नांव री पद्धति है,  दरअसल आपां रै अठै है ई नी। आपां रै अठै शिक्षा में ‘अेप्रिशियेशन ऑफ आर्ट’ ‘अेप्रिशियेशन ऑफ मोन्युमेंट’ इत्याद रा ‘कोर्सेज’ राखणा चाइजै। इणसूं ‘चेंज’ आवैला। अर आज ओ करणो बौत जरूरी ई है। पण, फिलहाल आपां रै अठै इण भांत री नीं तो कोई व्यवस्था है अर नीं ई कोई गतिविधि।

 

जुगल परिहार :  अे जका जगै-जगै ‘म्यूजियम’ खोल्योड़ा है...?

 

विष्णु श्रीधर वाकणकर : अे जका ‘म्यूजियम’ है, अे ई बडा अधूरा ई। अबै जियां, इणां में हड़प्पा, मोहेंजोदड़ौ इत्याद रा बरतन अलमारियां में सजा’र मेल दिया है। गांव रा लोग आवै, अर उणां नै देख’र परा जावै। उणां नै आ मालूम ई नीं पड़ै क अे कांई चीजां है अर इणां रौ कांई महत्व है! तो म्यूजियमां में आं चीजां रै साथै-साथै उण-उण काळ रै जीवण रा चित्राम ई लगावणा चाइजै। अर आं चीजां रै बाबत ई उठै विस्तार सूं लिखवा’र ई राखणौ चाइजै।

 

अेक बार री बात बतावूं—हरियाणै रा कीं किसान सपरिवार ‘दिल्ली म्यूजियम’ देखण नै आया। म्यूजियम में हड़प्पा, मोहेंजोदड़ौ इत्याद रा बडा-बडा बरतन मेल्योड़ा हा, जिणां माथै चिपकियां लगायोड़ी ही। तो उणां में सूं अेक लुगाई बोली-‘अरे, अठै अे टूटा-फूटा बरतन क्यूं धरियोड़ा है? इणसूं तो बजार सूं अच्छा-अच्छा बरतन मंगा’र मेलता तो ठीक रैवतौ!’

 

क्यूंकै वां बरतनां रै साथै वां रै ‘बैक-ग्राउंड’ रै बारै में कीं जाणकारी नीं दिरीजी है, इण वास्तै देखण नै आवण वाळां नै नीं तो वे टूटा-फूटा बरतन ई समझ में आवै अर नीं वां रौ महत्व ई। जे शिक्षण री पद्धति सूं अे सारा म्यूजियम राख्या जावै तो निश्चित रूप सूं गांव रा लोग ई जाण-समझ सकैला। हां, अेक बात और, आं म्यूजियमां नै देखण सारू प्रवृत्ति ई आपां नै ‘डवलप’ करणी पड़ैला।

 

जुगल परिहार : विज्ञान री प्रगति रै फळसरूप आज प्राचीन वस्तुवां रै रख-रखाव रा केई नवा आयाम खुल्या है, अर पुरातत्व रै छेत्र में उणां रौ प्रयोग ई कर्‌यौ जा रैयौ है। वैज्ञानिक साधनां सूं प्राचीन वस्तुवां नै संरक्षित करणौ कठैई हानिकारक तो नीं है?

 

विष्णु श्रीधर वाकणकर : अैंड़ी है के कीं बातां में हानिकारक हुय सकै। जियां—पेंटिंग है। उणरै माथै आपां कोई ‘प्रिजर्वेटिव’ लगा दियौ। बारलौ परिणाम तो निकळग्यौ। पण आपां जकौ ‘प्रिजर्वेटिव’ लगायौ हां, उणरौ सौ या दो सौ बरसां बाद कांई नतीजौ निकळसी—आ बात आपां नीं जाणां।  उणसूं उण में खराबी ई पैदा हुय सकै। अर अैड़ौ हुयौ ई है।

 

इण शताब्दी री सरूआत में, हुसैना बाद रा जका शैलचित्र है, उणां में सूं कीं रै माथै अेक तरै रौ वार्निश ‘पेंट’ कर्‌यौ गयौ। वो वार्निश आज पीळौ पड़ग्यौ है, अर इण वजै सूं वे चित्र ई फीका पड़ग्या है। अैड़ौ अजंता रै चित्रां रै साथै ई हुयौ है। तो ‘प्रिजर्वेटिव’ लगावण री बजाय उणां नै जे ‘नेचुरल कंडीशन’ में ई राखण री कोई व्यवस्था करीजै तो ज्यादा ठीक है। पण फेरू ई, नवा नवा अैड़ा प्रयोग हुय रैया है जिणां रौ माध्यम रै रूप में उपयोग करणौ ई जरूरी है। अबै जियां—धातु री वस्तुवां है, लकड़ी री वस्तुवां है, जिणां रै के माथै ‘अेटमोस्फियर’ रौ प्रभाव हुवै, तो उणां माथै जे ‘प्रिजर्वेटिव’ लगा दियौ जावै तो अच्छी। तो ई इणां रौ कम-सूं-कम उपयोग करणौ ई ठीक रैवै।

 

जुगल परिहार :  ‘भारत-महोत्सव’ में जकी पुराणी चीजां अमेरिका अर फ्रांस भेजीजी, उणां में सूं घणकरी कीं-न-कीं टूट-फूट रै साथै पाछी आई। इण तरै रै उच्छबां में राष्ट्र री अनमोल धरोहरां नै भेजणौ कांई उचित है?

 

विष्णु श्रीधर वाकणकर : बिलकुल नी। अर अनेक लोगां इणरौ विरोध ई कर्‌यौ हौ। अबै ‘दीदारगंज री यक्षिणी’ नै ई देखलौ उणरै गाला माथै जका खाडा पड़ग्या है, उणां नै अबै कोई नीं मिटा सकै।

 

साच तो ओ है क दुनिया में कठैई ई पुरातात्विक वस्तुवां सारू अैड़ौ नीं हुवै। उदाहरण रै वास्तै म्हैं आपनै बतावूं—

 

फ्रांस माथै अमेरिका रौ बौत बडौ करजौ हौ। फ्रांस वो करजौ उतार दियौ। पण तो ई अमेरिका रा लोगां कैयौ के चूंके म्हां थां लोगां नै कठण परिस्थितियां सूं उबार्‌यौ हां, इण वास्तै थां लोगां नै इण अैसान रौ चुकारौ सांस्कृतिक दीठ सूं की दे’र करणौ चाइजै। तो इणरै वास्तै वे अमेरिका में प्रदरसित करण सारू ‘मोनालिसा’ रौ जकौ जगचावौ चित्राम है, मंगवायौ। तो उणरै वास्तै फ्रांस सुरक्षा रौ पूरौ-पूरौ प्रबंध कर्‌यौ। सुरक्षा रौ भार वो कोई अमेरिका रै भरोसै नीं छोड दियौ। वो जहाज में उण पेंटिंग रै साथै अेक ‘कंपनी’ सुरक्षा रै वास्तै भेजी ताकै उणनै कोई चोर नीं लेवै। पछै, अमेरिका पूग्यां जठै वा प्रदरसित करीजी, उठै आ व्यवस्था करीजी क इत्तै अेरियै में कोई नीं जा सकै। जे कोई जावतौ तो इलेक्ट्रोनिक घंटियां बाज उठती। इणी वजै सूं उणनै कीं नुकसाण नीं पूग्यौ।

 

अैड़ौ आपां रै मामलै में तो हुयौ नीं। आपां रै अठै सूं जकौ-जकौ माल गयौ, उणनै जहाज सूं उतारणौ-चढावणौ आपां रै लोगां रै सामी तो हुयौ नीं। ओ काम तो आपां दूजां रै भरोसै छोड दियौ हौ। तो अैड़ी केई बातां हुई जिणा माथै चरचा हुवती रैयी है। अमेरिका सूं पाछौ आयौ अेक दुरलभ पैनल म्हैं देख्यौ। दो खंभा हा उण में अेक उण में बिलकुल नवौ हौ। तो अैड़ी केई बातां और ई हुई हुवैला जिणां रौ हाल आपां नै पतौ नीं पड़्यौ है। अमेरिका भेज्यां सूं पैली ई अठै रा लोगां बता दियौ हौ के उठै गया ओ हुय सकै अर हुयौ ई। पण आपां रा जका सरकारी अफसर है, वे इण बातां नै दबा’र राखै, क्यूंकै दोष तो उणां रौ ई है।

 

सो अैड़ी वस्तुवां बारै भेजणी किणी ई तरै सूं उचित नीं है। आजकाल तो इत्ता साधन निकळ आया है के उणां नै काम में लिया जा सकै। आपां हूबौहूब ‘प्लास्टरकास्ट’ में ढाळ’र भेज सकां हां। पण आपा रा लोग जका है, वे आ समझै क ‘म्हां बौत मोटौ उपकार कर्‌यौ है!’ अर अमेरिका में भेज’र ई हासल कांई हुयौ हुवैला! आपां री कलावा नै थोड़ौ-बौत ‘अेप्रिशियेशन’ मिल्य हुसी। वो तो आपां ‘प्लास्टर-कास्ट’ भेज’र ई हासल कर सकता हा!

 

जुगल परिहार  :   पुरातत्व अर पर्यटन दो न्यारा-न्यारा छेत्र है, पण आज अेकमेक हुयग्या है। जठै पुरातत्व शोध री मारफत प्राचीन तथ्यां रौ उद्घाटन कर’र उणां नै संरक्षित करै, उठै पर्यटन रौ नजरियौ बिलकुल व्यावसायिक है। कांई पर्यटन रौ बधतौ प्रभाव पुरातत्व रै वास्तै बाधकतो नीं है?

 

विष्णु श्रीधर वाकणकर : बाधक है, बिलकुल बाधक है। उदाहरण रै वास्तै म्हैं बतावूं—म्हैं झुम्मटका नांव री अेक महत्वपूरण ‘साइट’ भोपाळ रै नजीक 56 किमी माथै खोजी, जिणरौ उत्खनन करवा’र उणरै बारै में सारी बातां रौ पतौ लगायौ। उठै पैंटिंगा खूब है। 9 किमी में कोई 760 गुफावां है जिणां में पैंटिगां है। तो म्हांरौ काम ई बढ्यौ। उठै म्हे लोग च्यार चौकीदार राख दिया। अबै कांई है के हरेक आदमी उठै पूगै। कदै-कदैई तो पूरी-री-पूरी भरियोड़ी बस पूगै। उठै जका च्यार चौकीदार है, वे आ कैवै के ‘आवण वाळा’ सगळा गुंडा किसम रा लोग हुवै! म्हां जद उणा नै कैवां क अठी न घुसौ, उठी मत घुसौ, तो ई घुस जावै। अबै म्हां च्यार जणा कांई कारं, जद वे जबरदस्ती घुस जावै! वे जगै-जगै आपरा नांव लिख देवै। चाक सूं लिखै जका तो म्हां लोग पाणी सूं मिटा देवां, पण जद भाटां सूं खरोंच’र लिखै तो कीकर मिटावां! तो वा चीज ई खतम हुय जावै जिणरै वास्तै क म्हां राखीजिया हां।

 

तो इण समस्या नै हल करण रै वास्तै ओ इज उपाव है क ‘पुरातत्व’ अर ‘पर्यटन’ रा डिपार्टमेंट अेक ई मिनिस्ट्री पर अेक ई मिनिस्टर रै ‘अंडर’ में हुवै। दोनूं रै समन्वय सूं इज अे समस्यावां दूर हुय सकै। नींतर ‘पर्यटन’ जकौ है, वो आपरै प्रोत्साहन में लाग्योड़ी रैवैला अर ‘पुरातत्व’ है, वो आवण वाळा जका दरसक लोग है, उणां नै संभाळ ई नीं सकैला। अर आ स्थिति बौत खतरनाक है। सो दोनां रौ साथै-साथै हुवणौ बौत जरूरी है।

 

जुगल परिहार : राजस्थान रौ कुण-सो छेत्र पुरातात्विक दीठ सूं सिमरिध है?

 

विष्णु श्रीधर वाकणकर :  म्हारौ तो कैवणौ ओ है के राजस्थान रौ कुण-सो छेत्र अैड़ौ है जकौ पुरातात्विक दीठ सूं सिमरिध नीं है। पूरौ-रौ-पूरौ राजस्थान ई सरस्वती नदी रौ छेत्र रैयौ है।

 

सरस्वती नदी हिमालय सूं निकळ’र राजस्थान मे आयै समंदर में मिलती ही। इणरौ सै सूं प्राचीन प्रवाह आज सूं 25 हजार बरसां पैली तांई अर उणसूं पैली 5 लाख बरसां तांई डीडवाणा हुवतौ थकौ लूणी नदी रै रस्तै बालोतरा पूगतौ हौ अर लूणी रै ई मारग-मारग उत्तर-पूरब कच्छ रै रण में मिल’र नानू रण नसलरोवर हुवतौ थकौ खंभात री खाडी (दिखणी समंदर) में मिलतौ हौ। लूणी नदी आज ई सरस्वती रै पैलै वाळै प्रवाह में ई बै रैयी है। अरावळी परबत रै ऊपर ऊठण सूं ओ प्रवाह खंडित हुयग्यौ अर अबै उत्तरी अरावली सूं लूणी नै फगत बिरखा-जळ ई मिलै। जदकै पैली उणनै सरस्वती रौ जळ मिलतौ हौ।

 

लारलै 5 लाख सूं ले’र 25 हजार बरसां रै बीच अरावळी रौ हिस्सौ ऊंचौ उठ्यौ, जिणसूं सरस्वती रौ प्रवाह उत्तर कानी सिरक्यौ। उणी काळ में हिमालय में ई भौगोलिक उठाव हुय रैयौ हौ। इण कारण माना रै नजीक निकळण वाळौ ओ प्रवाह-मारग बीच-बीच में अवरुद्ध हुवतौ गयौ अर वेदां में वरणित नदीतमा सरस्वती में पाणी रौ बहाव कम हुवतौ गयौ। महाभारत सूं पैली ओ प्रवाह बीकानेर छेत्र में जा’र अवरुद्ध हुयग्यौ हौ। उणी काळ में राजस्थान समंदर ई लारै हटग्यौ। समंदर रौ ओ लारै हटणौ रामबाण री बजै सूं समंदर सूखण री रूपक-कथा बणग्यौ।

 

महाभारत जुद्ध रै बगत सरस्वती रौ प्रवाह काळीबंगा अर अनूपगढ तांई हौ अर बळराम उणरी तीरथ जात्रा ई करी ही। आ नीचलै प्रवाहां रै बंद हुया उणां रै तट रा रैवासी आबू, गुजरात अर सौराष्ट्र इत्याद में जाय बस्या अर वे अंबाजी, पुष्कर अर सोमनाथ रै कनलै प्रवाहां नै सरस्वती नांव दे’र उण प्राचीन नदी रै प्रति आपरी श्रद्धा अऱ ममता नै जीवती राखी।

 

महाभारत सूं पैली री घी बस्तियां अर महाभारत में वरणित समुन्नत नगर व्यवस्था रा दरसण सरस्वती रै तट माथै आयै प्रदेसां में ई हुवै। हड़प्पीय अर प्राक्हड़प्पीय नगरां रा अे समूह गंगा, जमना अर सरस्वती रै सरूआती मैदानी प्रदेसां में—कुरूक्षेत्र सूं ले’र हनुमानगढ तांई अर सूरतगढ सूं ले’र पाकिस्तान में आयै बहावलपुर रै आखती-पाखती सै सूं बेसी है।

 

अेक बात और, बीकानेर में जठै सरस्वती रौ प्रवाह दिक्खण कानी मुड़ै, उठै तांई अेक विसाळ रेत रौ संचै है, जकौ पैली बैवती सरस्वती रै लायोड़ौ है। स्यात् ओ राजस्थान समंदर रौ वो छेहलौ हिस्सौ हुसी, जठै 25 हजार बरसां पैली सरम्वती उणसूं मिलती ही।

 

जुगल परिहार :  वियां राजस्थान में पुरातात्विक?

 

विष्णु श्रीधर वाकणकर :  संभावनावां! म्हैं तो कैवूं राजस्थान में हदभांत ई संभावनावां है। राजस्थान में तो बौत बडी-बडी ‘साइट्स’ है—सरस्वती रै किनारै ई अर सरस्वती रै अलावा ई। पण सै सूं मोटी समस्या तो आ है क इणां री खुदायां कुण करै? हाल तो ओ है क काळी बंगा, आयड़ इत्याद तक री ई पूरी खुदायां नीं हुय सकी है। पछै ओ नवौ काम करै तो कुण करै! ओ आपां री शिक्षा पद्धति री दोष है क वा देस री संस्कृति रै प्रति नीं तो अठै रै लोगां में कोई रुचि पैदा करै अर नीं ई उणां में सूं अैड़ा विद्वान ई त्यार करै क वे संस्कृति सारू काम कर सकै। आ ई वजै है क पुरातत्व रै छेत्र में काम करणियै विदवानां री आज धापनै कमी है। बाकी आखै देस में सै सूं बेसी पुरातात्विक ‘साइट्स’ राजस्थान में है। अर राजस्थान में तो पाषाण युग सूं संस्कृति रा अवशेष मिलै। पुरातात्विक दीठ सूं राजस्थान घणौ धनी है। मिलती ही।

 

जुगल परिहार :  वियां राजस्थान में पुरातात्विक…?

 

विष्णु श्रीधर वाकणकर :   संभावनावां! म्हैं तो कैवूं राजस्थान में हदभांत ई संभावनावां है। राजस्थान में तो बौत बडी-बडी ‘साइट्स’ है—सरस्वती रै किनारै ई अर सरस्वती रै अलावा ई। पण सै सूं मोटी समस्या तो आ है क इणां री खुदायां कुण करै? हाल तो ओ है क काळी बंगा, आयड़ इत्याद तक री ई पूरी खुदायां नीं हुय सकी है। पछै ओ नवौ काम करै तो कुण करै! ओ आपां री शिक्षा पद्धति री दोष है क वा देस री संस्कृति रै प्रति नीं तो अठै रै लोगां में कोई रुचि पैदा करै अर नीं ई उणां में सूं अैड़ा विद्वान ई त्यार करै क वे संस्कृति सारू काम कर सकै। आ ई वजै है क पुरातत्व रै छेत्र में काम करणियै विदवानां री आज धापनै कमी है। बाकी आखै देस में सै सूं बेसी पुरातात्विक ‘साइट्स’ राजस्थान में है। अर राजस्थान में तो पाषाण युग सूं संस्कृति रा अवशेष मिलै। पुरातात्विक दीठ सूं राजस्थान घणौ धनी है। भूषा में रंगील छटावां बिखेरी। इणां रै अलावा शंकरलाल परिहार (जैतारण) रौ ‘थाळथळैया’ निरत, बौजांराम (बीजळी) रौ ‘शूकर’ निरत, जगमाळ (सालवा) रौ ‘ढोल’ निरत अर प्रेम भाट रै प्रस्तुत कर्‌योड़ै ‘कठपूतळी’ प्रदरसण ई देखणियां री भारी भीड़ खैची।                                                                                                                              

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : विष्णु श्रीधर वाकणकर ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : मई 1988
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