राजस्थानी सिमरिध भासा, इणरी पूंजी अथाग
अंतररास्ट्रीय ख्यातीप्राप्त गुजराती रा सिरैनाम कवि, ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ विजेता, गुजरात विद्यापीठ रा भूतपूरव उपकुळपति, केन्द्रीय साहित्य अकादेमी रा वरतमांन अध्यक्ष अर राज्यसभा रा मौजूदा सदस्य उमासंकरजी जोसी साहित्य-जगत में मोटा मनीसी गिणीजै। गुजराती साहित्य में आपरौ योगदांन जुगां-जुगां तांईं याद कर्यौ जासी। राजस्थांनी भासा बाबत आपरा कांईं विचार है, जांणण सारू आपसूं अहमदाबाद में भेंट-वारता करी ‘माणक’ रा उपसंपादक डॉ. नरसिंघ राजपुरोहित।
नरसिंघ राजपुरोहित : राजस्थानी भासा बाबत आपरा कांईं विचार है? कांईं आप उणनै अेक सवतंत्र भासा मांनौ?
उमासंकर जोसी : भाई, जिकी भासा घर-व्वाड़ी, खेत-खळै अर हाट-बजार में बोलीजै-बरतीजै, वा भासा तौ है इज। जिणरै माध्यम सूं करोड़ां मिनख आपरै मन रा भाव परगट करै, बोलै-बतळावै, रीझ अर खीझ जतावै, गीत-गाळ गावै, वा भासा नीं तौ पछै कांईं है? रैयी बात बोलियां री, ज्यूं के आपरै उठै मारवाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती इत्याद न्यारी-न्यारी बोलियां है, आ तौ उण भासा री समरिधी है, गरिमा है। ग्रेट ब्रिटेन जिसै नैनै से’क मुलक में बोली-बोली रौ मोकळी आंतरौ है। वेल्स, स्काटलैंड अर इंगलैंड री बोलियां में फरक है। वेल्स में तौ अंगरेजीपांत अल्फाबेट्स ई बत्ता है। इण भांत ‘बारै कोसां बोली पलटै’ रौ नेम तौ संसार भर में लागू हुवै। सगळी बोलियां रै अेकठ रूप सूं इज भासा बणै। राजस्थानी री आपरी जूंनी परंपरा है। आ पूंजी अथाग है, इण वास्तै इणरौ विसेस महत्व है।
नरसिंघ राजपुरोहित : राजस्थानी रै विकास सूं रास्ट्र भासा हिन्दी रौ अहित हुसी, इण बात सूं आप कठा तांईं सहमत हौ?
उमासंकर जोसी : आ बात धरामूळ सूं इज खोटी। अेक भासा सूं दूजी भासा रौ अहित कदैई नीं हुवै। हिन्दी आपणी रास्ट्रभासा है, उण रूप में उणरौ महत्व है। वा सगळै देस री संपरक भासा है। कोई पण भारतीय भासा रौ विकास रास्ट्रभासा खातर सुभ है, मंगळकारी है। भारतीय संस्कत रै मूळ में इज अेकता में अनेकता है। कोई पण भारतीय भासा विकासमांन बणै, उण में आछौ साहित्य लिखीजै तौ रास्ट्रभासा वास्तै हितकर है। आज केई भारतीय भासावां रौ साहित्य अनुदित हुयनै हिन्दी री श्रीव्रद्धि करै तो हिन्दी नै इणसूं लाभ इज है नुकसांण कांईं है? इणसूं उल्टी देस में भावात्मक अेकता वधै।
नरसिंघ राजपुरोहित : केन्द्रीय साहित्य अकादमी राजस्थानी भासा नै साहित्यिक मांनता दीवी। इण आधार माथै उणनै संवैधानिक मांनता ई मिळणी चाहिजै। इण बाबत आपरा कांईं विचार है?
उमासंकर जोसी : राजस्थांनी री अस्मिता नै देखतां, उणनै साहित्यिक मांनता देवणी वाजब ही, इण वास्तै साहित्य अकादमी देय दी। पण आगै उणनै संवैधांनिक मांनता देवणी के नीं देवणी आ दूजी बात है अर वा सरकार सूं ताल्लुक राखै, अकादमी इण पड़पंच में नीं पड़णी चावै। अकादमी रौ कांम तौ सगळी भारतीय भासावां नै अेक निजर सूं देख’र वांरै विकास खातर प्रयत्नसीळ रैवणौ है, जिकौ वा करै इज है। बाकी बातां में वा नीं पड़ै। अबार थोड़ाक दिनां पैली ‘कांकणी’ रौ सम्मेलण हुयौ। महारास्ट्र रा मुख्यमंत्री ई उठै मौजूद हा। उठै जिकौ प्रसंग चाल्यौ, उण में अकादमी कांनी सूं म्हैं आ इज बात कैयी।
इण बाबत आप लोगां नै पैली आपरै घर में कोसिस करणी चाहिजै। रेवरेंड टेलर आपरै व्याकरण में इण बाबत अेक घणी भरम री बात लिखी है—‘यथा भाषक तथा भाषा।' भासा कोई नैनी मोटी कोनी हुवै। वा तौ बोलण-वाळां रै कद माथै निरभर करै। भासा री डीघाई-खटराई बोलण-वाळां रै डील माथै आधारित हुवै। बोलणवाळा जे फोरा है तौ भासा ई फोरी है अर जे बोलणवाळा लूंठा है तौ भासा ई लूंठी है।
म्हनै साहित्य अकादमी री सरूपोत री पैलड़ी मीटिंग री बात याद है। पंडित जवाहरलालजी अध्यक्ष हा। भासा बाबत पंडितजी रा विचार घणा ‘लिबरल’ हा। उण मिटिंग में आप फरमायौ हौ के जिण भासावां में साहित्य मौजूद है, जिणरै माध्यम सूं प्रजा आपरै हिवड़ै रा भाव परगट करै, उणनै भासा मांनण में कोई अेतराज कोनीं। भाव भावना रौ माध्यम है। इणसूं देस री अेकता नै बळ मिळै। पण भासा रै नांम माथै विवाद नीं हुवणा चाहिजै।
नरसिंघ राजपुरोहित : राजस्थानी री प्राचीन समरिध परंपरा अर वींरै गुजराती सागै संबंधां बाबत कीं फरमावण री किरपा करावौ?
उमासंकर जोसी : गुजराती अर राजस्थांनी सगी जांमणजाई बैना। 16 वीं सताब्दी रै पैली तौ अै अेक इज भासा ही, जिकी ‘मारूगुर्जरी’ बाजती। इणरै पछै गुजराती रौ विकास न्यारौ सरू हुयौ अर वा धीरै-धीरै राजस्थांनी सूं अळगी हुयनै स्वतंत्र भासा बणगी। प्राचीन साहित्य दोनूं रौ अेक इज है। इणरौ कारण औ के ‘गुजरात’ रौ जनम भीनमाळ नगर सूं हुयौ। भीनमाळ गुजरात री प्राचीन राजधांनी ही। वखत बीतां भीनमाळ बिखर्यौ अर पाटण राजधांनी बण’र आबाद हुयौ। आगै चाल’र पाटण उजड़यां अहमदाबाद बसियौ। अहमदाबाद सूं आगै वधतां वधतां गुजरात मुंबई तांईं पूगौ। पण मुंबई महारास्ट्र में जावतां गुजरात पाछौ आयनै अहमदाबाद में कायम हुयग्यौ। इण भांत गुजरात रौ जनम भीनमाळ में हुयौ अर मुंबई ताईं जात्रा कर'नै पाछौ अहमदाबाद आय'नै थर थापन हुयग्यौ। इण भांत गुजरात रौ तौ उदगम इज राजस्थांन री धरती सूं हुयौ। निजू रूप सूं म्हारौ तौ इण धरती सूं घणौ नेड़ौ संबंध रह्यौ।
नरसिंघ राजपुरोहित : वौ किण भांत? कीं खुलासैवार फरमावण री मेहरबानी करावौ?
उमासंकर जोसी : म्हारौ जनम भूतपूरव ईडर रियासत रा बामणा गांव में हुयौ। जिणठौड़ आडावळ भाखर री कतार खतम हुवै, उण ठौड़ नैनी-नैनी रड़कलियां है, वांरी तळेटी में म्हारौ गांव आयौ थकी। म्हे मूळत: मेवाड़ा ब्राह्मण बाजां। यूं मारवाड़ अर ईडर रै घराणां रा घणा जूना अर नेड़ै रा संबध रह्या, इण वास्तै औ इलाकौ नैनी मारवाड़ इज बाजै। टाबरपणै में म्हैं माथै पर मारवाड़ी ढंग रौ मोळ साफौ बांधतौ अर होळी रै मौकै मजै सूं फाग गावतौ। म्हनै फाग री वा धुन आज ई घणी आछी लागै अर याद है। देखौ म्हैं आपनै फाग गायनै सुणावूं.... (जोसीजी भाव विभोर हुयोड़ा आंख्यां मींच’र बांमणै गांव री गळियां में पूग जावै अर फाग री कड़ियां लय-ताळ सागै गुणगुणावण लागै, म्हैं इण मनीसी रै मूंडै कांनीज देखतौ रैय जावूं। कितरी सरळता अर कितरी सादगी। अहम् के मोटपणै रौ कठैई नांमनिसांण ई नीं।)
नरसिंघ राजपुरोहित : आप राजस्थानी रौ समरिद्धी परंपरा बाबत कीं फरमावता हा?
उमासंकर जोसी : हां तौ म्हैं आ कैवै हौ के इणरौ प्राचीन गद्य-पद्य घणौ समरिद्ध रह्यौ पण होळै-होळै वखत रै साथै केई बदळाव आया। देस में मुगल राज आयौ अर वींरै सागै अरबी-फारसी रौ प्रचार बढ्यौ। मुगल थाकां अंगरेज आया अर वांरै सागै अंगरेजी भासा आई। इण भांत बीच में दो-तीन सईकां वास्तै राजस्थानी रौ विकास अवरुद्ध सो रह्यौ। इणरै खास कारण राजकरण रौ प्रभाव, आवागमन रै साधना री कमी न्यारा-न्यारा देसी रजवाड़ां नै अेकठ बांधण वाळी कोई केन्द्रीय राजसक्ति रौ प्रभाव अर सिक्षा नै ‘प्रेस’ री कमी इत्याद रह्या। इणसूं गुजराती रै ज्यूं राजस्थांनी रौ विकास नीं हुयौ अर आधुनिक युग में आवतां-आवतां वा लारै रैयगी।
नरसिंघ राजपुरोहित : गुजराती रै सतत विकासमान रैवण रा काईं कारण रह्या?
उमासंकर जोसी : गुजराती री आ खूबी रैयी के राज पलटियां देस में भलाईं अरबी-फारसी रौ प्रचलण वध्यौ के अंगरेजी रौ, गुजराती आपरी अस्मिता कायम राखी। राज करतावां री भासा रौ अठै असर नीं पड़्यौ, उल्टौ अठै आयौ जिकौ गुजराती बणग्यौ। आज ई अठैरा रैवासी सगळै धरमां रा लोग (मुसलमांन, पारसी तकात) फगत गुजराती बोलै। इणरै विकास में केई रजवाड़ां रौ घणौ सहयोग रह्यौ अर सै सूं मोटौ कारण सिक्षा अर प्रेस रौ प्रचार-प्रसार रह्यौ। इणसूं गुजराती खूब फळी-फूली। गुजराती अखबार ‘मुंबई समाचार’ ठेट सन् 1812 में छपणौ सरू हुयग्यौ हौ। इणरै सागै लगन वाळा अर त्यागी साहित्यकार आगै आया, जिणां आपरै सिरजण रै पांण इण भासा रै भंडार नै समरिद्ध कियौ। अै सगळा हालात राजस्थान में नीं हा, जिणसूं मां-जाई सगी बैनां में सूं अेक लारै रैयगी अर दूजी आगै निकळगी। इतरौ हुवतां थकांई आज राजस्थानी गुजराती रै घणई नेड़ी है, इतरी नेड़ी के कीं प्रत्यय इत्याद हटायां दोन्यूं री प्रकति अेक-सी निजर आवै, जिण में ईं सबद साम्य तौ अणूंतौ इज है।
नरसिंघ राजपुरोहित : लेखन रै छेत्र में राजस्थानी री ‘आईडेन्टिटि’ कायम राखण वास्तै म्हांनै किण-किण बातां रौ ध्यांन राखणौ चाहिजै?
उमासंकर जोसी : राजस्थानी आज ‘मेप’ माथै तौ आ इज गई है। इणरी पूंजी अथाग है। दरअसल में आपां आपणै धन नै ओळखां इज कोनीं। आज इण धन नै ओळख नै दुनियां आगै लावणौ आपरौ सिरै फरज है। राजस्थांनी रौ ‘दूहौ’ अभिव्यक्ति री कितरी सबळी विधा है। संस्कत रै ‘सुभाषितम्’ सूं ईं इक्कीस बैठै। कम सूं कम सबदां में मोटी सूं मोटी बात कैवण में इणरौ कोई मुकाबलौ इज नीं। आप लोगां नै लेखन रै छेत्रां में ई होळै-होळै बोलियां री अेकरूपता कायम करणी पड़सी। इण मांमलै में ‘मारवाड़ी’ नै ‘लीड’ करणौ चाहिजै। मारवाड़ी री आपरी अेक साहित्यिक परंपरा है, जिणसूं वा ‘मानक रूप’ लेवण री खिमता राखै। पण ध्यांन औ राखणौ पड़सी के दूजी सगळी बोलियां री खूबियां नै लेय नै भासा आपरौ रूप संवारै अर वौ रूप इसौ हुवै के सगळा वीं नै आसांनी सूं समझ सकै।
राजस्थानी रा लेखक खासा सिमरथ है। वांरौ फरज है के वै भूतकाळ अर भविस्यकाळ दोन्यूं कांनी ध्यांन राखै। राजस्थानी साहित्य री पुराणी पूंजी आगै लावण रै सागै-सागै वै आपरै लेखन नै निरंतर प्रगतिसीळ ई ई बणावै। 1962 में लिखती बखत 1982 अर 2025 रौ ई पूरौ ध्यांन राखै।
नरसिंघ राजपुरोहित : राजस्थानी में लिखती वखत संस्क्रत रै तत्सम सबदां नै मूळ रूप में अर तद्भव सबदां नै सागण रूप में लेवणा आपनै कठा तांईं ठीक लागै?
उमासंकर जोसी : संस्क्रत सगळी भासावां री उदगम-स्थळी है। सगळी भारतीय भासावां वींरा तत्सम सबदां नै सागण रूप में इज स्वीकार किया है। वां में कोई फेरदार नीं कियौ है। इण हिसाब सूं राजस्थानी नै ई तत्सम सबदां नै तौ सागण रूप में इज लेवणा चाहिजै। भासा विग्यांन रै हिसाब सूं औ इज तरीकौ सही अर उचित है।
नरसिंघ राजपुरोहित : राजस्थानी री प्राचीन वरणमाला में ‘श’ अर ‘ष’ दोन्यूं वरण कोनीं। वांरी ठौड़ ‘स’ काम में लियौ जावै। कांईं आ प्रेक्टिस कायम राखणी चाहिजै?
उमासंकर जोसी : प्राचीन वरणमाळा में ‘श’, ‘ष’ वरण भलांई मत हुवौ, ध्वनि तौ हुवैला इज। इणरै अलावा जद आप संस्क्रत रा तत्सम सबद सागण रूप मे लेस्यौ तौ ताळव्य अर मूरधन्य दोन्यूं ‘श’ ‘ष’ रौ प्रयोग लाजमी हुय जासी। इण वास्तै जूनी प्रैक्टिस कायम राखणी उचित नीं लखावै।
नरसिंघ राजपुरोहित : ‘माणक’ रै बाबत आपरी कांईं राय है? अर बीं रै मारफत आप कांईं संदेस देवणौ चावौ?
उमासंकर जोसी : ‘माणक’! माणक बहू सारूं छै, रूपाळू छै। अेमनी मारफत राजस्थान नी छवि देखवा नै मळै छै। म्हूं अेनी उन्नति इच्छुं छूं!”