म्हारी फिलमां होमवर्क
बिज्जी री लोक कथा ‘दुविधा’ पछै मुक्ति बोध री रचनावां माथै ‘सतह से उठता आदमी’ फिलम बणा’र कला-फिलमां रा निदेसक मणी कौल फेर चरचा में आया। अबार दिल्ली रै आठवैं फिलम फेस्टीवल में वांरी छोटी फिलम ‘अराइवल’ नै सिरै फिलम होवण रौ इनांम मिळियौ।
तेजसिंघ जोधा : अबार थांरौ कुणसी फिलम रै सिलसिलै में जोधपुर आवणौ व्हियौ?
मणीकौल : जरमन टेलीविजन वास्तै रेगिस्तांन अर रेगिस्तांन री लाइफ माथै अेक फिलम बणावण सारू आयौ। इण फिलम में चारेक लाख री लागत आसी अर मार्च 81 तांईं आ फिलम म्हनै पूरी करणी पड़सी। इणी सिलसिलै में अबार जैसळमेर अर जैसळमेर रा गांवड़्यां में फिरियौ। रेगिस्तांन, रेगिस्तांन रौ जीवण अर रेगिस्तांन री संस्क्रती, तीनां रौ अेक ‘काम्पेक्ट’ रूप फिलम में उतारवा रौ मन। हाल ‘प्रोसेस’ में हूं, ज्यूं के फिलम में ‘कमेंट्री’ नीं राखवा रौ सोचूं। म्हनै लागै ‘कमेंट्री’ राख्यां फिलम ‘डोकूमेंटरी’ व्है जवैला अर आवाज रै दबाब में दरसक फगत वौ ई देखैला जिण सारू आवाज उण नै कहसी।
तेजसिंघ जोधा : मणी भाई, थांरी नवी फिलम ‘सतह से उठता आदमी’ रा नवम्बर-दिसम्बर 80 में दो खास दरसाव भोपाळ अर दिल्ली में व्हिया, कैड़ौ रैसपोन्स रह्यौ?
मणीकौल : ‘मिक्स’ टाइप रौ रैसपोन्स जांणौ। केयां नै फिलम खूब बढ़िया लागी अर केयां नै बिलकुल ई नीं। खुद नै मार्क्सवादी कहता पांच-सातेक ततइया भोपाळ में ईं फिलम दरसाव री बगत तणतणाया, डिस्टर्बेंस क्रिएट करवा री कोसिस कीवी। अर इणी भांत दिल्ली में ईं। भोपाळ में तौ घणी कीं पार पड़ी नीं। पण दिल्ली में क्यूं पूछौ बात! मूंडै आई गाळियां, मणी कौल मुड़दाबाद, असोक बाजपेयी मुड़दाबाद अर अठा तांईं के टोटीड़ा म्हनै कूटण-मारण नै त्यार। जांणै मुक्तिबोध री रचनावां माथै फिलम बणा’र म्हैं वांरौ पर्सनल नुकसांण कर दियौ व्हूं। इचरज री बात तौ आ के वांरै लारै हिन्दी साहित रै अेक नांम नामवर मार्क्सवादी विदवांन रौ रौ हाथ हौ, जिण रै सारू नींतर म्हारै मन में खासी भली इज्जत ही।
तेजसिंघ जोधा : कीं न कीं नुकसांण तौ थे करियौ ई व्हैला, नींतर कूटै मारै जैड़ी रीस रौ कांईं काम?
मणीकौल : व्है सकै के म्हारी फिलम वांरा मतलब कोनी पूरै। वांनै ‘सतह से उठता आदमी’ फिलम में खुद रै जीव में बिचारियोड़ौ मुक्ति बोध रौ हीरौ-रूप कोनी मिळै। मध्यवरगी आदमी रौ रोटी-कपड़ा मकान कोनी लाधै। म्हैं फिलम री मारफत ‘मैसेज’ कोनी देवूं। मुक्तिबोध रौ वौ जुझारू रूप म्हांरै कनै कोनी, जिणनै अै दुधारू बणाय लै। घांदा तौ केई। सायद इणीं वास्तै आंनै म्हारै सूं ‘फिजीकल अैन काउन्टर’ लाजमी लाग्यौ अर लागै। औ ‘फिजीकल अैन काउन्टर’ आंरौ ई बोल्योड़ौ सबद। आंनै कुण समझावै के मुक्तिबोध इतरौ आसांनी सूं मार्क्सवादी नीं हौ, जितरौ के वै उणनै समझणौ चावै या वै खुद है।
तेजसिंघ जोधा : थे मार्क्सवाद नै मुक्ति बोध सूं कीकर ‘रेलेट’ करस्यौ?
मणीकौल : मुक्तिबोध आध्यात्मिक स्तर माथै मार्क्सवादी हौ। चिमकण नै औ सबद ई घणौ। ज्यूं गीता कैवै के आध्यातम तौ सभाव। आप सूं आप मतौ-मतै बिना कोसिस वौ मार्क्सवादी लागतौ। रचना सूं बारै खुद रै मार्क्सवादी होवण रा ढोल घुरावण री उणनै जरुत कोनी पड़ती।
तेजसिंघ जोधा : लेखक रै रूप में मुक्तिबोध थांनै कैड़ौ लागै?
मणीकौल : गजब। भासा अर भाव री जैड़ी घांण-मथांण मुक्तिबोध रै कनै, वैड़ी किणी दूजै लिखारै कनै कोनी। मुक्तिबोध मूळ रूप सूं कवी हौ। साहित री दूजी विधावां में ईं उणरौ पगफेरौ, उणरै कवीरूप नै पोखवा रौ ई कांम करतौ दीखै।
तेजसिंघ जोधा : कांईं अैड़ौ नीं, जैड़ौ के म्हनै लागै, के मुक्ति बोध री कवितावां, कवितावां कम अर कविता सारू करियोड़ौ होम वर्क बेसी, थांरी कांईं राय?
मणीकौल : अग्जेक्टली! आ ई म्हैं कैवणी चावूं। वौ खुद मानतौ, के उणरी कवितावां अधूरी। वै कविता नीं, कविता सारू करियोरड़ी पचत, कविता सारू करियोड़ौ होम वर्क, जीयां के म्हारी फिलमां, फिलमां नीं, फिलमां सारू करियोड़ौ होम वर्क। अर औ ई वौ तर्क, जिकौ कठै न कठै म्हनै अर मुक्ति बोध नै जोड़ै।
तेजसिंघ जोधा : फिलम बणावतां थांरौ मूळ ‘अैप्रोच’ कांई रैवै?
मणीकौल : आई, के अैड़ी फिलम बणाऊं जिण सूं ‘मीडिया’ नै माठ अर मरजाद हाथै आवै। मिसाल सारू संगीत रा घराणा लौ। वांरा कलाकार आप आपरै घरांणै री सुद्धता बणायोड़ी राखै, भलांईं पीढ़ियां तांईं वांमै मोटौ कलाकार मती जलमौ। पण किणी दिन इण सुद्धता री परम्परा रै कारण ईं वांमै मोटौ कलाकार जलमै। फिलम सारू ई म्हैं आ री आ बात मानूं। अैड़ी परम्परा तौ बणै। भलांईं म्हैं काळीदास नीं व्हूं, पण अैड़ी गुंजायस तौ बणायोड़ी राखूं के किणी दिन काळीदास जलम सकै। इण वास्तै म्हनै माध्यम री सुद्धता अर मरजाद सबसूं लाजमी अर मोटी बात लागै।
तेजसिंघ जोधा : सत्यजीत रे रै बाबत कांईं कहस्यौ?
मणीकौल : सत्यजीत रे रौ सगळा सूं मोटौ योगदांन तौ औ, के वै फिलमां नै थीटर री बंधोकड़ी अर अणूतै असर सूं बारै काढी। रे सूं पैला फिलमां में अैक्टर व्हैतौ, जदई सड़क, मकांन, पेड़-पौधा अर दूजी-दूजी चीजां व्हैती। वांरी न्यारी न्यारी वकत अर बजूद पैला नीं हौ। रे री फिलमां बतायौ के आं चीजां रै होवण सारू अैक्टर लाजमी नीं। अै सब खुदौ-खुद में ईं आवगी अर पूरी। अलग सूं ईं घणौ कीं कैवै, आंनै फगत मौकौ देवण री जेज। औ अेक मोटौ कांट्रीब्यूसन हौ।
पण सिक्सटीज रै पछै सत्यजीत रे री अैप्रोच ढबियोड़ी सी लागै। यूं लागै जांणै कोई मिनख खुद कौ ई ‘केरीकेचर’ करतौ व्है। ज्यूं हिन्दी री कमर्सियल फिलमां रै अैक्टर दिलीप कुमार नै लौ, आं तमांम बरसां में वौ खुद नै दोहरातौ अर खुद रा ई विडरूप त्यार करतौ दीखै।
तेजसिंघ जोधा : 'नेहरू फैलोसिप' रै दौरांन थे कांईं कांम करियौ?
मणीकौल : म्हारौ कांम वौ रौ वौ, नेहरू फैलोसिप सूं पैलांई, बिचैई अर नेहरू फैलौसिप रै पछै ई, के फिल्म मीडिया रा कीं अैड़ा ‘लॉज’ हाथै आवै, जिण सूं इण माध्यम री औटोनोमी कायम होवै अर दूजी-दूजी चीजां माथै इणरी निरभरता कम सूं कम रैय जावै। अर फिलम बणांवणौ इतरौ आसांन व्है जावै के निरदेसक सीधौ कैमरौ अर टेपरिकार्डर लेय’र फिलम बणावण री पोजीसन में आय पूगै। आ आपच म्हनै ताजिन्दगी चालती लागै। फिलम मूंघौ मीडिया अर सरकारी अर गैर सरकारी दूजा ई केई घांदा।
तेजसिंघ जोधा : मणी भाई, अेक सवाल फेर। मोहन राकेस री रचनावां माथै थे लगातार दो फिलमां बणाई, उणरै साथै कांम करवा रौ कैड़ौ तजरबौ रह्यौ?
मणीकौल : हां, म्हैं राकेस री कथा लेय ‘उसकी रोटी’ अर नाटक लेय ‘आषाढ का एक दिन’ बणाई। राकेस अेक टेलेन्टेड राइटर हौ। ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक रै रूप में कैड़ौ हौ, इण सूं म्हनै कीं लेणौ-देणौ नीं, उणरौ टेक्स्ट (पाठ) म्हनै फिलम परपज रै वास्तै ‘अपीलिंग’ लागौ। इण फिलम में साथै-साथै काम करियां सूं ई राकेस नै आपरी थीसिस ‘नाटकीय सबद’ रौ मूळ विचार हाथै आयौ।