फिलम तो फिलम ई हुवै, भाषा कोई सी ई क्यूं नीं हुवै
राजेन्द्र व्यास : खरबंदाजी, आप स्टेज रो बौत बडा कलाकार रैया हौ, स्टेज सूं फिलमां में आवतां ई आपरी पैली फिलम ‘शान’ सूं ई आप आछौ स्थान बणाय लियौ, जकौ क आज ई बरकरार है। तो आप आ बतावौ क स्टेज अर फिलम में काम करता थकां आप नै कैड़ौ लाग्यौ?
कुलभूषण खरबंदा : दोनूं ई न्यारा-न्यारा छेत्र है, सो दोनां में ई काम करण में ई फरक है। फिलम अेक कठण अर तकनीकी माध्यम है, अर इणरै वणण री प्रकिया लंबी हुवै। अठै बरसां लाग जावै अेक फिलम रै पूरौ हुवण में। फिलम में किणी चरित्र री भूमिका निभावण सारू अेक ‘मूड’ नै बणायौ राखणौ पड़ै, जदकै स्टेज माथै जावण रै बाद कलाकार जकौ कीं कर रैयौ हुवै—उण में ‘मूड’ आपौ-आप ई बण्यौ रैवै। इणरै अलावा फिलमां में ‘अेक्शन’ अर ‘कट’ रै बीच चरित्र नै अभिनीत करणौ पडै। अठै ‘लाउड अेक्सप्रेशन’ जरूरत नीं हुवै, कारण के सूक्ष्म भावां री अभिव्यक्ति कैमरै री आंख पकड़ लेवै। अर उणरौ असर दरसक देर तक नी भुलाय सकै।
राजेन्द्र व्यास : आपरी निजर में आपरौ सबसूं जीवंत अभिनय किण फिलम में रैयौ?
कुलभूषण खरबंदा : अभिनय जीवंत है या मुड़दो—ओ निरणै तो सिरफ दरसक ई कर सकै। म्हे लोग तो हरेक चरित्र नै जीवंत ई अभिनीत करां। पण जीवंत चरित्र अभिनीत करियां उपरांत ई जे फिलम किणी वजै सूं प्रदरसित नी हुय पावै तो म्हां कांई कर सकां?
हां, अेक बात और है क जद-जद ई म्हां कोई चरित्र अभिनीत करां अर उणनै पाछौ देखां तो हरेक बार अैड़ौ लखावै जाणै कठैई-न-कठैई कीं अधूरौ सो है। अर उण में कठैई-न-कठैई गलती निगै आई जावै।
उण बगत अैड़ौ लागै क जे यूं नीं हुय’र, यूं हुवतौ तो कीं बत्तौ प्रभावशाळी बण पड़तौ।
सो आ तो अेक पूरी प्रकिया है—जठै कठै'ई अभिनेता नै तो कठै'ई तकनीशियनां नै समझौतौ करणौ पड़ै। अर उणी समझौतै रै परिणाम स्वरूप अधूरौपण रैय ई जावै। इण ई वास्तै फिलम अेक मुस्किल मीडियौ मानीजै।
राजेन्द्र व्यास : अेक साथै केई फिलमां करण री वजै सूं न्यारै-न्यारै चरित्रां रै ‘मूड’ नै बणायौ राखण सारू अप कांई करौ?
हां, आ बात आप ठीक पूछी। अठै हुवै ओ के दो-तीन बरसां में जा’र कठैई अेक फिलम पूरी हुवै, नतीजन अेक साथै केई चरित्र निभावणा पड़ै। ‘मूड’ बणायौ राखण सारू म्हां उण चरित्रा नै भलीभांत समझ लेवां अर वैड़ा ई अभिनीत ई करां। फेरूं ई की कमियां तो रैवै ई। तद ई तो अधूरौपण लागै। आ अेक ‘टैजेडी’ है।
राजेन्द्र व्यास : फिलमां में व्यस्त हुय जावण रै कारण आप स्टेज सूं तो कट-सा ई ग्या हौ या हाल ई स्टेज माथै काम करौ?
कुलभूषण खरबंदा : स्टेड सूं म्हारौ नातौ कदैई नीं टूट्यौ। फिलमां में व्यस्त हुवण रै कारण इत्तौ तो जरूर है क म्है खुद स्टेज माथै काम नी कर पा रैयौ हूं, पण कदै-कदैई कोई ड्रामौ देखण नै जरूर जाया करूं अर जावतौ रैवूंला।
राजेन्द्र व्यास : राजस्थानी भाषा में बणण वाळी फिलमां में कांई आप काम करण री रुचि राखौ?
कुलभूषण खरबंदा : देखौ, फिलम तो फिलम ई हुवै, भाषा भलां ई कोई-सी ई क्यूं नी हुवौ। हां, ‘अेट्टिट्यूड’ यानी के वैवार रौ फरक जरूर हुवै। अेक बार री बात है, म्हैं पंजाबी भाषा री फिलम में काम कर रैयौ हौ। फिलम रौ निरदेसक बडी म्हैनत सूं अेक सेट बणवायौ। पण निरमाता बोल्यौ क ‘आ अेक प्रादेशिक फिलम है, कोई हिंदी फिलम नीं, सो अैंड़ी भव्यता री कोई जरूरत नीं। उणी दिन सूं म्हारौ मन प्रादेशिक भाषावां री फिलमां में काम करण सूं उचट ग्यौ।
दरअसल फिलम रौ निरमाण फिलम री मांग रै मुजब हुवणौ ई चाइजै। अबै फिलम वा चायै प्रादेशिक भाषा री हुवौ चायै हिंदी री।
वियां आ फिलम ‘लाखा’ ई राजस्थानी कहाणी अर परिवेश माथै आधारित है। अर अबार पैर्योड़ी म्हारी आ वेशभूषा तो आप देख ई रैया हौ। म्हनै घणौ लगाव है राजस्थानी संस्कृति अर राजस्थानी भाषा सूं।
अमूमन प्रादेशिक भाषावां री फिलमां रौ बजट बौत सीमित हुया करै, सो जद कोई जुद्धवाळी कहाणी या अणूंती ई भव्यता वाळी इतियासिक कहाणी ले’र फिलम बणावण री सोचै तो उणरौ बजट उणरै आडौ आय जावै। इण वास्तै कहाणी री मांग मुजब खुलौ बजट राख’र राजस्थानी फिलम बणावण री जे कोई सोचै तो म्है तो कांई—कोई ई नामी अभिनेता उण में काम करण सूं इनकार नीं करैला। अर वियां ई भाषा रौ इत्तौ महत्व कठै सिनिमा में! जद गूंगी फिलमां बणती ही उण बगत कठै ही भाषा!