राजस्थान रौ संगीत तो बौत ई मधुर, प्राचीन अर ‘रिच’ है

 

लता मंगेशकर अेक मुक्त स्वचंछंद आतमा है, अेक इस्यी आवाज जिकी नीं तो किणी परंपरागत घराणै सूं जुड़ी थकी है अर नीं ईं कला रै बारै उणरा आपरा कोई पूर्वाग्रह है। इणरै अलावा सिरमौर गायिका हुवण रौ घमंड ई बिलकुल नीं है।

 

लताजी अेक हस्ती बणगी है, जिणांरौ नांव दुनिया भर में भारतीय संगीत रौ पर्याय सो बण चुक्यौ है। इणां रौ व्यक्तित्व बौत संवेदनशीळ है, इण वास्तै इणां रै स्वरां रै अंतराळ में भाव-प्रवणता इण कदर व्याप्त हुय जावै क सुणणिया वैचारिक आग्रह रौ साथ छोड्यां बिना उण में डूब जावै।

 

गायन में ‘आकृतिक तत्व’ अर ‘आशय’ री अभिन्नता वाळै पगस नै अतिरिक्त महत्व नीं देवता थकां करूण, वीर अर सिणगार रा उभय पगस संबंधी भाव संसार री न्यारी-न्यारी मनोस्थितियां अर अनुभूतियां में गैरा उतर’र मानव संसार री अभिव्यक्ति माथै लताजी रौ बेसी बळ है। उणमें शास्त्रीय बारीकियां री जगै भाव प्रवणता अर ‘मूड्स’ री तरै अभिव्यक्तियां माथै वै खुद नै बत्ती केन्द्रित करै। स्वर-लालिल्य या स्वर-सौंदर्य इणरौ आकर्षण है।

 

कलाकार ज्यूं-ज्यूं ऊंचाइयां रौ परस करै। अलंकरणां सूं मुक्त हुवतौ जावै। मुरकियां, तानां री झड़ियां, गमक, खटका अत्याद सब गायन में अलंकरण ई तो है। अेक- अेक करनै सब छूट जावै। आखिर में जिकौ बचै, वो स्वर स्वर री शुद्धता है। लताजी रौ संगीत लगौलग खोज है। अेक शोध प्रक्रिया जिकी कलात्मकता नीं, जीवण री सत्यता चावै।

 

लताजी भाव गीतां नै जिण ढंग सूं आत्मसात् कर्‌या अर आपरी गायकी में उणरौ रूपांतर जिण ढंग सूं कर्‌यौ, उणनै बाद री गायकी में जगै-जगै देख्यौ जा सकै। मीरां रै भजनां रौ, ‘चालां वा ही देश’ लांगप्ले रिकार्ड में मीरां रै भजनां री प्रस्तुति ही। इण प्रस्तुतियां में भाववादी गायकी रै साथै-साथै जिका भाव-दरसण अर रूपाकार रौ समन्वय मिलै, वो देखणजोग है। इण भाव-दरसण में गैरे पैठ’र लताजी जियां जीवण रै मरम नै पकड़णौ चावै। संगीत में भाव-दरसण नै ओढणौ-बिछावणौ मान’र उणनै जीवण रौ तत्वज्ञान बणा लियौ।

 

लताजी जिका स्यात् संगीत रै साथै मोक्ष प्राप्त करणा चावै, संगीत रै सहारै मौक्ष प्राप्त करण सारू वै कीं ई कर सकै। स्वरां सूं साक्षात्कार करण रै वास्तै लताजी नै बौत मैनत करणी पड़ी है। जिण गायन री भाववादी शैली माथै बेसी ध्यान दियौ है।

 

लताजी री आवाज रै वास्तै केई विशेषण प्रयोग कर्‌या जावै—जादू भर्‌यौ, दिल माथै छा जावण वाळौ, लयात्मक, भावात्मक, आध्यात्मिक— अै सगळा ई विशेषण आपरी जगै ठीक नीं ई व्है, फेर भी सगळा ई मिल’र लताजी री आवाज री बराबरी कर सकै। इणां री आवाज, इणां री गायन शैली दिल रै तारां नै झंकृत करै, अंत: स्थळ नै थरथरा देवै, हंसावै, रुळावै, जीवण री सांझ रा हुवण वाळै लखाणां रै सामौसाम ऊभा कर देवै, अर कदैई अचाणचक ई बाळपणै री जद हर अनुभूति नवी लागै, जद हर सांस रोमांच पैदा करै। कुल मिला’र लताजी री आवाज आनंद अेक प्रखर शक्तिपुंज है।

 

लताजी री आवाज में दरद है, उणां री गायन शैली में लहरदार गुनगुनाहट है। वा दरद सूं चीत्कार करै, दुलार अर प्यार सूं भर्‌यै कोमळ स्वरां में फुसफुसावै। कदैई अचाणचक लागै जियां चटख रंगां रौ विस्फोट हुयग्यौ हुवै अर कदै-कदैई अल्हड़ हवा रै झौकै री तरै बांस रै झुरमुटां में सूं वा सांय-सांय करै जियां सरसराती जावै परी। कदैई इस्या छिण ई आवै जद वा देवदार रै जंगळ में बैवती तेज हवा री तरै तन-मन नै बींधती थकी निकळ जावै।

 

सूर्यनगरी जोधपुर में स्वर-सम्राज्ञी लता मंगेशकर आई। अठै वै राजकीय मेहमान हा। उणां रौ अठै परंपरागत तरीकां सूं स्वागत करीज्यौ। राजस्थान रा लोक कलाकारां आपरी कला रौ प्रदरसण ई वां रै सामी कर्‌यौ। राजस्थान रै संगीत सूं वै भाव विभोर हुय उठ्या। दिल्ली रवानै हुवण सूं पैली लता मंगेशकर सूं बातचीत रौ मौकौ मिल्यौ। इणां सूं बड़ी बेबाक़ बातचीत हुई, वा इण भांत है—

 

विष्णु पंचारिया :  राजस्थान रै संगीत रै बारै में आपरी कांई राय है?

 

लता मंगेशकर : राजस्थान रौ संगीत बौत ई ‘रिच’ है। संगीत रै अलावा साहित्य, ‘ब्रेवरी’ अर संस्कृति बौत खूबसूरत है। राजस्थानी लोक संगीत री प्राचीन परंपरा नै अक्षुण्ण राख्यौ जावणौ चाइजै। राजस्थानी लोक संगीत रौ देश-विदेश में घणौ नांव है। ओ हदभांत ई मधुर अर प्राचीन है, जिणनै पाश्चात्य आधुनिकता सूं अळगौ राखता थकां इणनै इणरै मौलिक रूप में जीवत राख्यौ जावणौ चाइजै।

 

विष्णु पंचारिया :  राजस्थान रै खान-पान रै बारै में आपरी कांई राय है?

 

लता मंगेशकर : ज्यादा कीं खायौ नीं। बाजरै रौ सोगरौ, गट्टां रौ साग, कढी इत्याद ई खायौ। इण बार म्हारौ पेट ठीक नीं हौ, सो नमूना ई चाख्या। पण इणसूं पैली म्हैं बौत खायौ है, क्यूंकै म्हैं राजस्थानी लोगां नै जाणूं। म्हांरी इंडस्ट्री में ई घणा सारा राजस्थानी है।

 

विष्णु पंचारिया :  दीदी, आज संगीत री दुनिया में बडौ बदळाव आयौ है, इणरै वास्तै आप किणनै दोषी मानौ?

 

लता मंगेशकर : इणमें दोष तो म्हैं किणी रौ ई नीं मानूं, क्यूंकै हरेक चीज बदळ रैयी है। आजकाल तो आपां रा बच्चा ई बदळ रैया है। उणां रा कपड़ा, उणां रौ सोचण रौ ढंग इत्याद। तो इण भांत हरेक चीज ई बदळ रैयी है। तो उणमें ‘म्युजिक’ ई बदळग्यौ है।

 

विष्णु पंचारिया : दीदी, पैली संगीत रै लारै फिलमां चाल्या करती, पण आजकाल अैड़ौ नीं... क्यूं?

 

लता मंगेशकर : हां, पैली तो अैड़ौ ई हौ, पण वो तो अबै नीं रैयौ। म्हैं आ नीं समझूं क ‘म्युजिक’ में गिरावट आई है, या कै जिण तरै सूं आप कै रैया हौ। अेक बात म्हैं कैवूंला कै पैली जित्ता म्युजिक डायरेक्टर हा, उत्ता आज नीं है। आज आप आंगळियां माथै गिणौला तो तीनेक ई म्युजिक डायरेक्टरां रा नांव ई जबान माथै आवैला—लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन अर बप्पी लाहिड़ी, बस खतम!

 

उण बगत कांई हौ कै गुलाम हैदर, खेमचंद प्रकाश, अनिल विश्वास, हुसनलाल-भागतलाल, सी. रामचन्द्र, नौशाद्, खय्याम, बसंत देसाई, सलिल चौधरी, मनमोहन, रोशन, शंकर-जयकिशन इत्याद अणगिणत बादशाह हा संगीत रा, फिलम इंडस्ट्री में। तो, इत्तौ अलग-अलग ‘स्टाइल’ रौ म्युजिक उण बगत मिलतौ हौ। अबै अैड़ौ नीं रैयौ।

 

विष्णु पंचारिया :  तो कांई आजकाल संगीतकार घणी मैनत नीं करै? कांई उणां नै गैरी जाणकारी नीं है?

 

लता मंगेशकर : नीं करै। अबै देखौ नीं, संगीत बौत ई सीमित हुयग्यौ है। तीन-च्यार म्युजिक डायरेक्टर जिकौ म्युजिक देवै, उठै तांई ई रैयग्यौ है। उणमें ई शंकर जयकिशन रौ प्रभाव आपनै मिलसी।

 

विष्णु पंचारिया : पण म्युजिक डायरेक्टर तो और ई बौत है!

 

लता मंगेशकर :  है, पण काम नीं है।

 

विष्णु पंचारिया : आजकाल जिकी नवी-नवी गायिकावां आ रैयी है, कांई वजै है कै वे जम नीं पा रैयी है, उणां नै स्थायित्व नीं मिल रैयौ है?

 

लता मंगेशकर : आ तो आप कै नीं सकौ। हाल तो सगळां नै ई काम मिल रैयौ है अर सगळी ई गा रैयी है—अनुराधा पौड़वाळ है, कविता कृष्णमूर्ति है, अलका याज्ञनिक है, साधना सरगम है। सब अच्छौ गा रैयी है। काम ई उणां रै कनै बौत है।

 

विष्णु पंचारिया :  आप तो फिलमां में लगै-टगै 40 बरसां सूं हौ, कीं बदळाव मैसूस करौ कै गायक-गायिकावां पैला कैड़ा हा अर आज कैड़ा है?

 

लता मगेश्कर : देखौ आप, म्हारी ‘जनरेशन’ रा जिका लोग हा, उणां री तो बात छोड ई दौ! म्हे लोग घणी करड़ी मैनत करी, म्हांरी जैड़ी करड़ी मैनत कोई नवौ गायक-गायिका नीं कर सकै—आ बात म्है बौत गरब सूं कै सकूं हूं। क्यूं कै रफी साहब, हेमंत कुमार, तलत महमूद, मन्नाडै, मुकेश, गीता, जोहरा बाई, शमशाद बेगम, म्हैं, आशा आद जैड़ी मैनत अबै कोई स्यात् ई करैला।

 

विष्णु पंचारिया : आजकाल जिका ई गायक आ रैया है वे रफी, मुकेश, किशोर या दूजै किणी री ‘कॉपी’ कर रैयौ है, आ जिकी गिरावट आ रैयी है, इणरै वास्तै दोषी कुण है?

 

लता मंगेशकर : इणमें म्युजिक डायरेक्टर्स नै कोशिश करणी चाइजै। फरज करौ कै मुकेश जैड़ी या रफी जैड़ी या किशोर जैड़ी आवाज आई है उणनै थोड़ौ समझा’र, उणसूं मैनत करा’र, उणरी ‘स्टाइल’ बदळ’र क्यूं नीं लावै आगै। आ जिकी आप कोशिश करौ कै इणनै म्हैं रफी जैड़ौ बणायौ है, थूं रफी जैड़ौ गाव—ओ क्यूं? उल्टै उणसूं ओ कैईजणौ चाइजै क’भई, थूं रफी जैड़ी ‘कॉपी’ मत कर! ओ जिकौ म्हैं सिखा रैयौ हूं, थूं अैड़ौ गाव!’ अैड़ी बात पैला कर्‌या करता हा म्युजिक डायरेक्टर्स।

 

म्हे लोग खेमचंद प्रकाश, मास्टर गुलाम हैदर, अनिल विश्वास, नौशाद, खय्याम, बसंत देसाई इत्याद रै साथै गाया हां। वे लोग तो म्हांनै सिखाया करता हा कै ‘नहीं भई, अैड़ौ मत करौ!’ ‘रिहर्सल’ करवाया करता हा वे। इण भांत मारग-दरसण मिल्यौ म्हांनै। उण जमानै में नूरजहां ही। म्हारी खुद री ई शैली ही, फेरूं ई म्हां सूं ओ इज कैयौ जावतौ हौ। अर आज ओ हाल है कै वो इज चाइजै जिकी ‘कॉपी’ है।

 

(लताजी री इण चरम सीमा माथै पूगण रौ जस आपां नै उण जमानै री ‘रिहर्सल’ अर संगीतकारां रै मारग-दरसण नै देवणौ हुसी। जे अैड़ौ आज रै गायक-गायिकावां नै मिल्यौ हुवतौ तो कांई आज अेकाध लता या अेकाध रफी पैदा हुवता! जरूर हुय सकै हा, पण आज जीवण गतिशीळ हुय चुक्यौ है अर गति संगीत नै ई आपरै घेरै मांय लेय लियौ है। अबै तो संगीत निर्देशक अेक ई बगत में 20-30 फिलमां रौ संगीत त्यार करण लाग्यौ है। आ ई वजै है कै आज रा संगीतकार बेगार टाळण री हद तांई संगीत रचना करण लाग्या है। नीं तो संगीतकारां रै कनै आज रिहर्सल रौ बगत है अर नीं गायकां रै कनै। अबै तो तेज गति रा गायक अर संगीतकार सब काम फटाफट करण री फिराक में रैवै। इण तरै ‘रिहर्सल’ नांव री चीज अबै फिलम-इतिहास सूं लुप्त हुयगी।

 

लताजी रै बाद उणां री जगै लेवण वाळी कोई गायिका हाल तांई तो निजर नीं आई। अर इणरी वजै ई आ इज है, स्यात् म्हारी आ बात कीं लोगां नै पसंद नीं आवै, पण लताजी री आवाज फिलम संगीत नै मिल्यौ अेक वरदान है। तद रा संगीतकार ई इण बात नै भलीभांत समझै अर आपरै काल रै गीतां नै अजर-अमर हुवण रौ जस लताजी नै ई देवै।

 

संगीत ई गाणै में कीं स्थान अैड़ा हुवै, जठै संगीतकार नै गायक रौ गायिका कानी सूं  अेक खास ‘इफेक्ट’ री जरूरत हुवै। ओ ‘इफेक्ट’ उणा नै सबदां री मारफत संगीतकार नीं समझा सकै हा। लताजी में आ समझ ही। संगीतकार लताजी री अचूक पकड़ अर अदायगी री वजै सूं बार-बार मशहूर हुवता रैया। लताजी री आवाज बीच रै बगत में संगीतकार सूं ई बडी हुयगी ही। अर इणी आवाज री वजै सूं केई दिग्गज संगीतकारां रै संगीत में निखार आयौ। इणनै देख’र अैड़ौ लागै मानौ आ आवाज आकाश री तरै हुयगी हुवै।

 

आज रै संगीत में वाद्य संगीत री इत्ती बहुलता हुवै कै गायक-गायिकावां नै तो सिरफ खाली जगै में आपरी आवाज भरणी हुवै। इणरौ दोष गायक-गायिकावां नै नीं दियौ जा सकै। आजकाल तो संगीत ई टिकाऊ हुवण रै बजाय तत्कालीन लोकप्रियता कानी झुकतौ जा रैयौ है।)

 

विष्णु पंचारिया : आप लगै-टगै हर भाषा रा गीत गाया हौ, आप ओ किंया कर लेवौ?

 

लता मंगेशकर : हां, ओ तो है। म्हैं देवनागरी में लिखिया करूं अर उणरौ ‘मीनिंग’ पूछ लेवूं। इणरै अलावा आदमी किण तरै उणरौ उच्चारण कर रैयौ है, इण बात माथै ध्यान देवूं। अर जिण तरै गावै, उणनै ध्यान में राख’र कोशिश करूं कै वो अैड़ौ ई बणै।

 

विष्णु पंचारिया : अब तांई कित्ताक गीत गाय लिया?

 

लता मंगेशकर : म्हारै कनै इणरौ कोई ‘रिकार्ड’ नीं है।

 

विष्णु पंचारिया : प्रादेशिक भाषा री फिलमां सारू सरकार नै की मदद करणी चाइजै?

 

लता मंगेशकर : प्रादेशिक भाषा री फिलमां नै बढावौ देवण सारू सरकार नै कीं करणौ चाइजै। उण प्रदेश री सरकार नै चाइजै कै वा मदद करै। म्हांरी मराठी फिलमां सारू तो घणी कीं कोशिश कर रैयी है। कीं लोग बणा रैया है, आगै उणांरौ नसीब है। फिलम इज नीं बणै अर नीं चल पावै तो आ नसीब री बात है, पण की न कीं मदद कर रैयी है अर करणी ई चाइजै। इणसूं कांई हुवै कै उठै री संस्कृति कायम रै सकै, पण उठै ओ नीं हुवणौ चाइजै क हिंदी फिलमां री तरै अश्लीलता बड़ जावै।

 

विष्णु पंचारिया : आजकाल द्विअर्थी संवाद बौत आ रैया है!

 

लता मंगेशकर : म्हांरी मराठी में ई बौत हुयग्यौ है, ‘डबल मीनिंग’ वगैरा। अेक जमानौ हौ कै मराठी फिलमां इत्ती अच्छी बणती ही कै वैड़ी हिंदी में ई नीं बणती ही। पण अबै इत्ती गिरावट आयगी है कै म्हांरी मराठी फिलमां में ई हिंदी जैड़ी सब बातां सरू हुयगी है। ओ नीं हुवणौ चाइजै। उण प्रदेश री संस्कृति हुवणी चाइजै। म्हैं आ नीं कैवूं कै संस्कृति माथै फिलम बणावौ अर ‘बिजनेस’ नीं, मिलै पण अैड़ौ ई नीं हुवणौ चाइजै जैड़ौ कै आज हुय रैयौ है। ओ तो बौत खराब है। आपरै अठै रौ तो पतौ नीं कै राजस्थानी फिलमां बण रैयी है के नीं, पण द्विअर्थी गीत-संवाद नीं हुवणा चाइजै।

 

विष्णु पंचारिया : राजस्थानी फिलमां सारू आपनै गीत गावण रौ कोई प्रस्ताव मिलै या दूजी किणी भाषा री छोटै बजट री फिलम रौ प्रस्ताव मिलै तो?

 

लता मंगेशकर :  म्हारी ना कठै है, छोटै बजट री फिलम हुई तो कांई हुयौ। म्हैं तो केई जगै पइसा लिया ई नीं, केई जगै मांग्यां नीं। म्हैं कदैई अैड़ौ नीं करूं कै कोई छोटै बजट री फिलम आई अर मना कर दियौ हुवै। म्हैं समझ सकूं कै ‘प्रोविंशियल’ फिलम में बजट कित्तौक हुवै!

 

विष्णु पंचारिया : आप माथै औ आरोप लागतौ रैयौ है क नवी गायिकावां नै आप आगै बढण नीं द्यौ या उणां नै बढावौ नीं दियौ?

 

लता मंगेशकर : देखौ, आपनै म्हैं अेक बात बतावूं—ओ सवाल म्हारै सूं बौत लोग पूछता रैया है, पण अैड़ौ कदैई हुवै नीं। जे भगवान किणी नै ‘टेलेन्ट’ देवै तो वो कदैई सामी आयां बिगर नीं रैवै। जद म्हे लोग आया हा तद आज सूं केई गुणा बत्ता ‘सिंगर’ हा। सो कोई किणी नै आगै बढण सूं नीं रोक सकै। ओ कैवणौ बौत छोटी बात है, अैड़ौ करणौ नीं चाइजै। आज ई कित्ती ई गायिकावां आगै आई है।

 

विष्णु पंचारिया : अेक सवाल— लताजी रै बाद कुण?

 

लता मंगेशकर : इणरौ जबाब म्हारै कनै तो नीं है।

 

विष्णु पंचारिया : आपरौ सबसूं पसंद रौ गीत?

 

लता मंगेशकर : म्हारौ पसंद रौ गीत है—“आएगा आने वाला..!”

 

(बंबई रै ‘ठाणे महानगर पालिका’ में लताजी स्वागत भाषण में कैयौ— “आज रै संगीत री जड़ जीव ई नीं है, इण वास्तै म्हैं गावणौ कम कर दियै है। अव्वल दरजै रा संगीतकार अबै आपां रै बीच में नीं है। जिका हा, बै इण संसार में नीं रैया। उणां रै बाद तो मानौ संगीत री ज्यान ई गयी परी।”

 

लता रै बाद कुण?—ओ सवाल आज ई अनुतरित है। पण, उणां रै बाद दूसरी लता रौ निरमाण क्यूं नीं हुयौ?—इणरौ जबाब ई लताजी रै भाषण में है।

 

ओ साच है कै जद लताजी आया हा, तद उणां नै संगीतकारां रौ मारग-दरसण मिल्यौ, पण आज नीं तो वैड़ा संगीतकार है, अर है ई तो उणां रै कनै बगत कोनीं कै वे गायक-गायिकावां नै ‘रिहर्सल’ करवा’र कीं सिखावै। कदास, अैड़ौ हुवै तो स्यात् लताजी तांई नीं तो लताजी रै कनै तांई तो पूग जावै।

 

अेक किरण-सी झलक कठैई दीखै तो आज री गायिका अनुराधा पौड़वाळ में। जिणरी आवाज में अेक रूमानियत है। अनुराधा हर गीत अंतस सूं गावै। शास्त्रीय बारीकियां री जगै भाव-प्रवणता ई उणरै वास्तै महत्वपूर्ण है। उणरी आवाज सूं लागै कै संगीत संबंधी चिंतन अनुराधा  कर्‌यौ है। अनुराधा माथै ई भाववाद रौ गैरौ असर देख्यौ जा सकै। हाल ई में दो कैसेट ‘दुर्गा सत्पशती’ अर ‘तुलसी भजनावली’ रिलीज हुई। इणनै सुणण रै बाद म्हनै लागौ कै अनुराधा ई स्वरां सूं साक्षात्कार कर लियौ स्यात्। इणरै वास्तै भौत मैनत करणी पड़ी हुसी। स्वरां री शुद्धता अनुराधा में विद्यमान है।)

स्रोत
  • पोथी : माणक पारिवारिक राजस्थानी मासिक ,
  • सिरजक : लताजी सूं विष्णु पंचारिया री बंतळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : जनवरी 1989
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