राजकुमार रिजवी अर गज़ल गायकी

राजस्थान रै झूंझणू जिलै रै मंडावा गांव रै परंपराऊ कला-घरांणै में सन 1946 में जलम्या। संगीत री सरूआती सिक्सा आप आपरै पिता उस्ताद नूरमोहम्मद साहब सूं लीवी। रिजवी साहब खुद नै मेहदी हसन रौ भारत में पैलौ चेलौ मांनै। यूं मेहदी हसन ई मंडावा रा रैवण वाळा अर राजकुमार रा चाचा है। इंद्राणीजी नै, जिका के दिल्ली सूं संगती में अेम. अे. है, सुखी दाम्पत्य जीवण चावना सास्त्रीय संगीत सूं गजल-गायकी रै छेत्र में लाय ऊभी करी, ताकै पति-पत्नी दोनूं साथै-साथै रै सकै।

 

गोविन्द कल्ला :  आप खास कठै रा सा?

 

राजकुमार रिजवी : म्हैं राजस्थांन रै झूंझणूं रै मंडावै रौ कलावंत हूं।

 

गोविन्द कल्ला : आपरै संगीत री सास्त्रीय सिक्सा किण री छत्तर-छींयां में कठै अर कैड़ी व्ही?

 

राजकुमार रिजवी : सिक्सा सरूपोत में तौ पिताजी अर घर रा बडा-बूढा री छत्तर-छींयां में ई व्ही। पछै जमालुद्दीन भारती अर सुसीलकुमार सक्सेना कनै ई सीखियौ। गजल-गायकी में म्हैं गंडौ उस्ताद मेहदी हसन खां साहब सूं बंधवायौ। खां साहब ई आपां रै राजस्थांन रा ई है।

 

गोविन्द कल्ला : सिक्सा जद’क आपरी सास्त्रीय संगीत में व्ही ही, पछै अैड़ा कांईं कारण बणिया के आप गजल गायकी नै अपणाय ली?

 

राजकुमार रिजवी : म्हैं कलावंत घरांणै रा हां, सो घर रा सै जांणकार बुजरग छोटै थकै सूं ई म्हारै गळै री बारी कियां, उणरौ रुख, हरकतां अर वौ किण तरै री गायकी रै वास्तै माफिक व्हैला, देख’र ई पछै उणी’ज तरै री गायकी वास्तै तालीम दीवी अर दिरवाई। म्हारौ गळौ वां नै इण गायकी रै वास्तै ठीक लागौ।

 

गोविन्द कल्ला : आ वाजब ई लखावै के आपरौ गळौ मीठौ है। छोटी-छोटी मुरकां, आवाज री सफाई, स्वरां री सजावट इत्याद रै कारण ई गजल-गायकी आपरै वास्तै घणी मुफीद है। अेक बात आ बतावौ के ध्रुवपद-धमार री गायकी अर दसा सास्त्रीय संगीत रै सीखण सूं गजल री गायकी में आपनै कांईं फायदौ लखायौ?

 

राजकुमार रिजवी : औ सवाल आपरौ बौत चोखौ अर गजल-गायकी रै वास्तै अहम ई है। ध्रुवपद-धमार री गायकी री मीड़ अर गमक ‘शेरां’ रै सबदां रै बीच रै छिपियोड़ै अरथां नै न्यारा-न्यारा रूपां सूं पेस करण में बौत मदद करै अर ख्याल री गायकी, मुरकां, छोटी तानां अर तय्यारी रै वास्तै जरूरी है। अै सैंग बातां गजल री गायकी नै निखार देवै।

 

गोविन्द कल्ला : सास्त्रीय गायन रै रियाज अर सैंग बातां रै बाद ई आपरी गायकी में मांड-गायकी अर राजस्थानी लोक रंग बराबर अर अेकदम साफ लखावै। सा ग गसा, गममग, पम मग गग रेसा इत्याद रै चलण री गतां साफ निंगै आवै?

 

राजकुमार रिजवी : आपां रै अठै कैया करै के ‘दांत पैली आया के जीभ?’ बस, वा ई बात है। मांड तौ रग-रग में रमियोड़ौ है। मोटा-मोटा गवैया अलंकार री तानां रौ रियाज करनै ई जिकी बात सोरैसास गळै में नीं ला सकै, वै बातां तौ आपां रै रावणहथ्थै री बाज री ठोकरां में है अर वै अलंकार आपां टाबर थकां सूं ईं सैज गा रैया हां। अै रावणहथ्थै वाळी मीठी मुरकियां लोगां नै बडी चोखी अर मीठी लागै अर आ ई बात है के म्हारी गजल-गायकी आपरौ न्यारौ रंग रांखै। उस्ताद मेहदी हसन खां साहब रै गळै में ईं धोरां री लहरां री लहरदारियां रागां रै रूप में निकळै अर लोक रंग साफ निगै आवै। म्हैं राजस्थांन रौ हूं अर आप राजस्थांनी पत्रिका ‘माणक’ रै वास्तै म्हनै अै सवाल पूछ ई रैया हौ तौ म्हैं अेक खास बात बताय दूं के म्हैं म्हारै हर अेक कार्यकम में, चायै वौ हिन्दुस्तांन में व्हौ ने चायै विदेस में अेक-दो चीज, राजस्थांनी मांड है के सारंग है, के देस है, के सोरठ है—गाऊं ईं हूं।

 

गोविन्द कल्ला : आजकाल गजल जिण भांत गाईज रैयी है, उणरै बारै में म्हारी आ मांनता है के गजल गावण अर पढण में घणौ फरक है। जे गजल पढणी इज व्है तौ पछै शाइर रै खुद रै मूंडै सूं सुणणी या किताब पढियां सूं ई कांम चल सकै, पछै गावण री जरूरत कठै सूं सरू व्है? म्हारी जांण में शाइर जिण कल्पनावां अर अनुभूतियां नैं सबदां में पिरोय नै अरथ दियौ है, वै सब स्वरां रै मिठास रै महा समदर में गेय अर काकू प्रभावां सूं सांगीतिक निखार पाय नै साकार आणंदानुभूती दे सकै, इण वास्तै सायत गजलां रौ गावणौ जरूरी लागै। आपरौ कांईं ख्याल है?

 

राजकुमार रिजवी : म्हारौ ई ख्याल बिलकुल औ ई है के गजल गावण री जरूरत उठै सूं ईं मैसूस व्है, जठै हर अेक ‘शेर’ अर उणरै लफजां नै घणौ-घणौ अरथ देवणो चावां। गजल री गायकी आं दिनां आपरौ अेक खास ठायौ थरप लियौ है। इणसूं लोगां री रुची में, सुणण री री समझ में अर खास करनै सास्त्रीय संगीत रौ लगाव ई बधियौ है।

 

गोविन्द कल्ला : अेक सवाल औ ई है के घणकरा गावणिया-सुणणियां नै हळका इज मांननै चालै के मामूली लोग समझ दार व्हैला, बाकी तौ यूं ई व्है, सो घणा नै राजी करण सारू हळकी-फुळकी ई चीजां गावै। आपरा विचार?

 

गोविन्द कल्ला : नीं सा, इण बाबत म्हारौ निजरियौ बिलकुल न्यारौ है। आपां रै अठै कैवत है के ‘कैवण वाळां बिच्चै सुणण वाळा घणा चतर व्है’, सो म्है आ तहेदिल सूं माननै चालूं के चोखी चीजां लोगां नै सुणावणी चाहिजै अर वां नै आणंद देवणौ चाहिजै। म्हैं म्हारी सस्ती लोकप्रियता रै वास्तै संगीत रै साथै मरियां ईं गद्दारी नीं कर सकूं। गावणौ तौ कायदै रौ ई करूंला। बेकायदा कोई ई गायकी म्हनै बरदास्त को व्है नीं।

 

गोविन्द कल्ला : आपरौ औ संकळप वाकेई में बौत मोटौ संकळप है, जिकौ के आपनै गजल-गायकी री मूळधारा सूं विचळित नीं व्हेण दै अर आपर आपरौ रंग न्यारौ ई राखौ। अेक इण सवाल रै बारै में आपरा कांईं विचार है—घणकारा गायक गजल रै बिच्चै तानां पल्टा करै अर औ बतावणी चावै के वां नै सास्त्रीय संगीत रौ घणौ ग्यांन है। वै गजल नै स्वरां रौ जिमनास्टिक करावै के सरकस करावै, के रियाज रौ नाजायज फायदौ उठावैम्हारै कीं कम समझ में आवै। इण सवाल में म्हारै घणौ अटकाव है। आप ई फरमावौ के आप ई कदै-कदैई सरगमां बोलौ, इणरौ कोई खास मकसद है?

 

राजकुमार रिजवी :  आपरौ औ सवाल कीं अबखौ अर अहम है। म्हैं म्हारी जांण सूं आ कैऊं के कोई गवैयौ कित्तौ सास्त्रीय ग्यांन राखै अर कैड़ौ राखै, औ तौ आप जैड़ा बिराजै जिका धरतां ई भांप लै। पछै गजल नै सरकस बणावण री कत्तई जरूरत कोयनी, क्यूंकै कीं गवैया गजलां नै आं दिनां जमनास्टिक करा रैया है। म्हैं ई कठैई सरगम बोलूं, पण वां नै कोई तानां, पल्टा या छोटौ ख्याल नीं होवण दूं। रसिक श्रोतावां नै रचना करती बेळां जिका स्वर-समुदाय अेक अनोखौ आणंद, कौतूहळ अर प्रयोग-धरमिता रौ रचणात्मक आणंद म्हनै दियौ, वां री जांणकारी रै वास्तै म्हारी गजल री बंदिस रौ चलण बोल नै आणंद देऊं। उत्तौ इज के जित्तौ जरूरी व्है। स्वरां रौ न्यास अर छायालगां रौ आणंद दरसावूं, बस!

 

गोविन्द कल्ला :  सास्त्रीय संगीत रै ग्यांन सूं आकार अर अलंकार री कठोरता सूं बच’र आप रागां रा रूपाकार गाऔ, आ घणी चोखी बात है। अेक सवाल म्हारै फेर अटकियोड़ौ है। थोड़ौ करड़ौ ने खारौ है, सो माफी रै साथै पूछूं के आप केई बार फरमाइस माथै आपरै गुरू मेहदी हसन खां साहब री गजलां गाऔ। कॉपी किणी तरै री कला नीं व्हिया करै। पछै लोग अेक दूजै री हळकी तुलनावां ईं करै। हालांकै आपरी गायकी बिलकुल न्यारौ ठावौ राखै, पछै इणरी कीं खास कारण है?

 

राजकुमार रिजवी : आपरौ औ सवाल वाकेई में अेक अैड़ौ सवाल है, जिणनै हरेक क्रिटिक करिया करै अर उणनै इणरौ जवाब सोरैसांस को मिलै नीं। तद वौ आपरी इण चूक रौ दोस गवैयै रै माथै न्हाक नै आलोचना सरू कर दै। म्हारी आपनै आ अरज है के म्हैं किणी री ई नकल कोयनीं करूं। म्हारी आपरी न्यारी गायकी है। हां म्हैं फरमाइस माथै म्हारै गुरू मेहदी हसन खां साहब री कीं बंदिसां गा नै सुणाऊं अर वै ई बिलकुल म्हारी निजू अनुभूती रै साथै, जिकण नै के आप कत्तई नकल नीं कैय सकौ। बल्कै आप आ कैय सकौ के अेक बेटौ आपरै बाप री तरै या अेक चेलौ आपरै गुरू री तरै दो पग आगै ई देयनै, बैड़ौ ई सधियौ-सधायौ काम अर नांम कर रैयौ है—जैड़ौ के बाप या गुरू कर्‌यौ। बाप रौ उणियारौ बेटै में आवणौ खानदांन री खूबसूरती है, नकल या दोस नीं।

 

गोविन्द कल्ला : वा सा वा! रिजवी साहब आप अेक बौत मोटै अळूझाड़ नै साव सोरै-सोरै सुळझा दियौ। भौत मोटै साहितिक सवाल रौ थोड़ै में पूरौ-पूरौ जवाब दे दियौ। आपनै धिनवाद। अबै आप आ फरमावौ के आप अर  इंद्रांणीजी री सादी ‘लव मैरिज’ है कांईं?

 

राजकुमार रिजवी : हां, आप बिलकुल ठीक कैयौ। इंद्रांणीजी ई बौत चोखौ सास्त्रीय गायन करै। वै हिन्दुस्तान री मानियोड़ी गायिका किसोर अमोनकर री सागिरद है। म्हैं अेक दूजै सूं रूस रै अेक कार्यकम में मिलिया, पछै दोनूं जणा संगीत रै पांण अेक दूजै रै नेड़ा आवता ई गया। इंद्रांणी जी में दो बातां—रूप अर गुण—अेकै साथै अेक दूजै सूं बत्ता है, सो वै म्हनै टोळ लियौ। सेवट सैंग सामाजिक रूढियां अर बंधण तोड़’र म्हे तौ परणीज ई ग्या। म्हारै संगीत री साधना रै रूप अर ओप नै संवारण में इंद्रांणीजी रौ घणौ मोटौ हाथ है। म्हांरी आपस में अेक-दूजै री ठीक बैठै। वै म्हारी अर म्हैं वां री तारीफ करनै रियाज करां। जिणसूं संगीत री साधना नै दोवड़ौ सुख मिलै। इणनै सोनै में सुगंध कैय सकां।

 

गोविन्द कल्ला :  रिजवी साहब, म्हैं ईं भगवांन सूं आ ई प्राथना करां के आपरी साधना नै वै दिन दूणी ने रात चौगूणी उन्नती देवै। आप आपरौ कीमती बगत काढ’र इत्ती बातां बताई, इण वास्तै आपनै घणौ-घणौ धिनवाद।

 

राजकुमार रिजवी : अरे सा, राजस्थांनी वास्तै,  ‘माणक’ पत्रिका इत्तौ कर रैयी है, म्हारा चोखा भाग के म्हैं म्हारी मायड़ भासा री अेक मात्र पत्रिका रै वास्तै म्हारै अंतस री बातां कै रैयौ हूं, ‘माणक’ रै वास्तै म्हारी घणी-घणी सुभकामनावां हरमेस आपरै साथै है। आप ज्यूं हुकम दिरावौला, म्हैं हाजर हूं।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : राजकुमार रिजवी सूं गोविन्द कल्ला री बंतळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : सितम्बर 1982
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