राजस्थानी में अनेक भांत रौ साहित्य रच्यौ जावै

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : राजस्थानी भाषा री सेवा करण री बात आप कियां सोची अर इण में आपरा प्रेरणा स्रोत कुण रह्या?

 

नानूराम संस्कर्ता : म्हैं राजस्थानी भाषा री सेवा री बात कांई सोची। खुदरी भाषा तो मां रौ दूध हुया करै। इण दूध री भूख लागी अर म्हैं इण खातर तड़फा तोड़णा सरू कर्‌या, दूध रै तत्वां रै पोषण री इच्छा जागी अर इण सेवा में लाग्यौ। इण कानी दो च्यार पावंडा धर्‌या, जिणनै आप सेवा कैय सकौ। आ तो म्हारी खुराक है। ज्यूं भोजन सारू मिनख उतावळौ हुवै त्यूं ई म्हैं ई इण कानी लुळग्यौ। प्रकृति री प्रेरणा रै साथै मानीता नानाजी अर मां सा रै मीठा बोलां अर हरजसां रै झरणा सूं म्हारै हिवड़ै में मायड़ भाषा रा भाव जाग्या, म्हारौ परिवार ई म्हारी पैली पौसाळ बण्यौ।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : आज जिका लोग राजस्थानी भाषा नै अेक स्वतंत्र भाषा नीं मानै, आप वांनै कांई कैवणी चावौ?

 

नानूराम संस्कर्ता : आ बात अेक दम साची है कै कीं मुट्ठी भर लोग राजस्थानी भाषा नै अेक स्वतंत्र भाषा नीं मानै। भाषा कोई तर्क-कुतर्क करण री चीज नीं है। केई लोग कंचन नै कथीर बतावै पण वांनै रोक्या नीं जा सकै।

 

भाषाशास्त्र री दीठ सूं राजस्थानी अेक स्वतंत्र भाषा है। इणमें दुनिया रा जगचावा वीर रस, ऊंचै दरजै रा सिणगार अर इतिहास रा सांतरा चित्राम है। जूनै इतिहास में असमिया नै छोड़ कोरी राजस्थानी में ई गद्य साहित्य मिळै। डॉ. जे. अे. ग्रियर्सन आपरै भाषा सर्वेक्षण में राजस्थानी री न्यारी-न्यारी बोलियां रै समूह नै अेक चेतन ‘राजस्थानी भाषा’ रौ नाम दियौ है।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : राजस्थानी भाषा री अेकरूपता नै लेय’र जिकी शंकावा उठाइजै उण बाबत आपरा कांई विचार है?

 

नानूराम संस्कर्ता : राजस्थानी भाषा घणी समृद्ध अर जीवंत भाषा है, वा अजै तांई मान्यता सूं घणी अळगी आपरै पगां माथै ऊभी है। इण रै व्याकरण री विशेषतावां नै देख्यौ जावै तो लखावै के जैसळमेर सूं ले’र ढूंढाड़ तांई अर श्री गंगानगर सूं हाड़ौती तांई क्षेत्रां में बोलीजण वाळी बोलियां में कोरी अेकता ई नीं झळकै, सांस्कृतिक अेकता री सौरम पण आवै। इणां रा संज्ञा रूप, अेक वचन अर बहुवचन रूप, काळ रा रूप, कृदंतां रा रूप अर क्रियावां रै न्यारा-न्यारा सरूपां में पूरौ साम्य है। राष्ट्र भाषा रै नाम री आड में कीं लोग मायड़ भाषा रै रूंख री जड़ां माथै खुद ई कुल्हाड़ी चला रैया है।

 

हरेक भाषा में बोलियां न्यारी-न्यारी हुया करै, हिन्दी किसी अेक रूप ई है। यू.पी, पंजाब, बिहार, तमिलनाडु, आसाम इत्याद सगळी जगावां उणनै बोलण वाळा न्यारै-न्यारै ढंग सूं बोलै। हिन्दी में ई केई न्यारी न्यारी बोलियां है तो राजस्थानी माथै ओ कलंक क्यूं लगावौ। पण फेरूं ई जिण भांत हिंदी री अेकरूपता अर सरलता रा प्रयास चालै, उणी भांत राजस्थानी सारू ई चालता रैवणा चाइजै।

 

अठै लिखारा पद्य घणौ लिखै है पण गद्य रै जरियै अेकरूपता बणायी जा सकै। बोर्ड, विश्वविद्यालय, आकाशवाणी इत्याद में अेकरूपता रौ ध्यान देवणौ चाइजै। ‘राजस्थानी भाषा साहित्य अर संस्कृति अकादमी’ भाषा री अेकरूपता सारू औरूं प्रयास कर सकै।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : किणी भाषा रौ प्रचार सै सूं ज्यादा किंया हुय सकै?

 

नानूराम संस्कर्ता : घर में अर बारै, जठै-जठै ई आपसरी बातचीत में आपां आपणी मायड़ भाषा में ई बोलां। लिखणिया भाई-वीरा राजस्थानी में लिखै-भेजै। बाळकां नै चोखी-चोखी कवितावां सुणाई जावै। प्राथमिक शिक्षा राजस्थानी भाषा में ई दिरीजै। बाळ साहित्य रौ राजस्थानी में सिरजण कर्‌यौ जावै। लोक कलाकारां रौ उछाव बधायौ जावै। राजस्थानी में पत्र पत्रिकावां अर दैनिक छापा नीसरै इत्याद इण भांत राजस्थानी भाषा रौ इधकौ प्रचार-प्रसार हुय सकै। अर आपां रौ प्रयास सफळ हुय सकै।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : राजस्थानी भाषा रै प्रचार में कांई कसर रैयी के वा आज इत्ती लारै रैयगी?

 

नानूराम संस्कर्ता : राजस्थान रा पढ्या-लिख्या लोग अंगरेजी हिन्दी रै गळै जा लाग्या। राजस्थानी भाषा सूं लाजां मरतां अळगा हुयग्या, नतीजौ ओ हुयौ क राजस्थानी भाषा आपरै मूळ सूं अळगी हुयगी। अर दूजी प्रादेशिक भाषावां री दौड़ में लारै रैयगी है।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : आज रै समाज में जकी नुंवी पीढी जनम लेय रैयी है, घरां में जिकी ‘कानवेंट’ संस्कृति घुस रैयी, वां नै कियां राजस्थानी कानी मोड़ सकां, जिका क हिंदी अंगरेजी ई बोलै अर समझै?

 

नानूराम संस्कर्ता : आज जकी युवा पीढी है, वां नै कवितावां, प्रहसन-अेकांकियां रा आयोजण अर खेल तमासां रै साथै आपरै गौरवशाली इतिहास सूं जोड़ण रा प्रयास करीजणा चाइजै। मायड़ भाषा राजस्थानी में प्रतियोगितावां कानी वां नै मोड़्या जावै। इण संबंध में आ बात कैयी जा सकै—

 

“मायड़ रौ दरजौ ऊंचौ है
मायड़ रौ करज समूचौ है
कुण काढै इण में खूंचौ है
लिखतां कुण पकड़ै पूंचौ है
पण आ बूढी माता दांई
दूजोड़ी धण जीवण छाई
‘हम-तुम’ इंग्लिश अपणावणिया
मायड़ सूं लज मैमा पाई
कळजुग में हुया कपूत घणा
जो बहुवां रा वरदानी है
वन्यूं भूल रह्या निज भाषा नै
जो मायड़ राजस्थानी है

 

इण लोगां नै राजस्थानी कानीं मोड़ण खातर आ बात जरूरी है कै अनेक भांत रौ साहित्य रच्यौ जावै अर उणरा महताऊ ग्रंथां रौ प्रकासण हुवै उणां री महिमा रौ गुणगान हुवै।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : आम आदमी साहित्य रै किसै सरूप सै सूं ज्यादा प्रभावित हुय सकै?

 

नानूराम संस्कर्ता : यूं तो राजस्थानी भाषा री सारौ भंडार ई रिझावण वाळौ है पण कवितावां-गीत, हंसी-ठढां री रळियां अर लोक रंजन शैलियां जना-साधारण नै साहित्य प्रेमी अर भाषा रौ रिझाळू बणाय सकै।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास :  आप आपरै जीवण में साहित्य री सेवा रै साथै नुंवै साहित्य रौ खूब सिरजण कर्‌यौ, इण दोन्यूं में भाषा री सेवा, बेसी किस्यै सरूप में हुय सकै अर क्यूं?

 

नानूराम संस्कर्ता : म्हैं इण मरुभोम अर मरुभाषा रौ भगत हूं। शैक्षणिक उपाधियां रै सिलसिलै में राजस्थानी रै लोक साहित्य रौ स्हारौ लियौ हूं। म्हैं राजस्थानी लोक साहित्य धारा ने दूजां प्रदेशां में लोक साहित्य री तरियां अटूट नीं मानूं, धीमी गति सूं बैवतां म्हैं इण बिखर्‌योड़ै मोतियां नै पिरोवण रौ बीड़ौ उठायौ। डिगरी मिळ्यां पछै विभाग सूं म्हारौ शोध प्रबंध ई छपग्यौ। पण म्हारौ ओ मानणौ है क भाषा री कोई बेसी सेवा करणी चावै तो वा मौलिक साहित्य रै सिरजण सूं हुया करै। क्यूं के आज रा घणखरा साहित्य प्रेमी नगरां में बसे। वै लोक साहित्य कानी ध्यान कम देवै, वे तो फगत कहाणी, उपन्यासां रा कीड़ा हुवै, वां नै उण ढंग रौ ई साहित्य देवणौ चाईजै।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : आज साहित्य में नुंवा-नुंवा प्रयोग चाल रह्या है, लोक साहित्य लुप्त हुवतौ जा रह्यौ है.... तो कांई लोग इण लोक साहित्य नै भूल जावैला।? जे आ बात नीं है तो आज किस्यै साहित्य नै लोक साहित्य रो नांव दियौ जा सकै?

 

नानूराम संस्कर्ता : आज साहित्य में नुंवा-नुंवा प्रयोग सरू हुया है ओ तो विज्ञान रौ प्रभाव है अर उण प्रभाव री नुंवी पिछाण है। लोक साहित्य री लिखत कमी सूं लोक-शिक्षा रौ घणौ घाटौ हुयौ है। लोक साहित्य तो साधारण अणपढ जनता रै विसाळ हिवड़ै रौ अणभै-ज्ञान है। अर ओ कदैई खूटण वाळौ नी है।

 

जद आकाश में घूमनी हवाई जहाज देखी लोक हिरदै में हरख अर उमाव री भावना उमड़ी अर केई गीत बणग्या। उडता पतंगा नै देख दूजै रै पतगां नै करतां देख बाळक आपरी जीत रा अर दूजै री हार रा जका गीत गावै वां नै लोक साहित्य रै माध्यम सूं ई बखाण्यौ जाय सकै। लोक रै मूंडै सूं बोलीजण वाळो साहित्य ई लोक साहित्य कह्यौ जा सकै।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास :  दूजी भाषावां नै देखतां राजस्थानी भाषा में जकौ साहित्य सिरजण हुय रह्यौ है, या वो जिण सींव तांईं पूग्यौ है, कांई वा गति ठीक है? इण बाबत आपरा कांई विचार है!

 

नानूराम संस्कर्ता : दूजी भाषावां नै देखतां राजस्थानी साहित्य सिरजण री रफ्तार थोड़ी मोळी लखावै। आज रै समै में केई विषया माथै सिरजण री जरूरत है। विज्ञान अर गणित री तो कांई बात? ओजुं उपन्यास, निबंधां जिसी मोटी विधावां रौ ई घणौ टोटौ है। मूळ बात तो ज्यादा-सूं-ज्यादा साहित्य रचणै री है। साहित्य रै सिरजण, प्रकासण, विक्रय रा उपाय अर अकादमियां रा उदार भावां में बधापौ होवै तो चोखौ काम पार पड़ै नीं तो अेक कवि रै शब्दां में—

 

पोथी लिखी उमंग सूं,
छपवाई कर चाव।
आखर बिक्या बजार में,
रद कागद रै भाव॥

 

ठौड़-ठौड़ हाथ सूं लिख्योड़ा केई ग्रंथ पड़्या है, वां री छपाई रौ बन्दोबस्त हुवणौ चाईजै। राजस्थान रा सगळा कालेजां अर स्कूलां में राजस्थानी विषय अनिवार्य रूप सूं भणाइजणौ चाइजै।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : आंचलिक शब्दां रौ प्रयोग अर अेकरूपता अेक दूजै रौ विरोधाभास है। इण कारण कांई आंचलिक शब्दां नै छोड़ देवणौ चाइजै?

 

नानूराम संस्कर्ता : शब्दां रै भांत-भंतीला प्रयोगां सूं भाषा री बढोतरी हुवै। भाषा री अेकरूपता जुड़णी सरू हुवै। गांवां में आज केई शब्द अधमर्‌या पड़्या गिरणै खोता खावै। उणां रौ संकलण रोक देवणौ लोक माथै मोटौ जुलम हुवैला।

 

शब्द तो प्रवाह है, इण रै रुक्यां भाषा रौ विकास रुक जावैलौ। शब्दां री बढोतरी सूं आंचलिकता मतै ई खतम हुय जासी।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : आज रा साहित्यकारां रै बाबत कांई विचार है?

 

नानूराम संस्कर्ता : आज री दुनिया नै साहित्यकारां रै महत्व नै मानणौ पड़ैला। राजस्थानी साहित्यकारां री सजगता सूं दूजा साहित्यकारां नै आभास हुयौ है। राजस्थानी साहित्यकारां नै अबै आपरै अथाग साहित्य में उतर’र मोती निकाळना चाइजै। मोत्यां नै पावण सारू मैणत करणी पड़ैला नीं तो किनारै ऊभा रह्यां तो कीं नी बटैला। अकविता लिखौ’र भलां ई रबड़ छंद, व्याकरण अर साहित्य नै पढियां बिना साहित्य सिरजण कीं कम जचै।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : वयोवृद्ध साहित्यकार रै रूप में आप नुंवा साहित्यकारां नै कांई कैवणी चावौला?

 

नानूराम संस्कर्ता : म्हांनै भलांई थै वयोवृद्ध साहित्यकार कैवौ या बूढा खौपा। बूढा अर नुवां साहित्यकार पैला भी हा अर आजई है पण यां रौ मेळ कदै नीं हुयौ है। नुंवा साहित्यकारां नै सोचणौ चाइजै के बूढां रा तो दिन अबै थोड़ा है सो वां रा अनुभवां रौ फायदौ उठावणौ चाईजै। यूं ओ नियम सत्य है—डोकर डिगै अर छोकर जमै। नुंवां साहित्यारां नै थ्यावस राखणी चाइजै।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास :  राजस्थानी भाषा रै विकास में ‘माणक’ री भूमिका बाबत आपरा विचार?

 

नानूराम संस्कर्ता : राजस्थानी मासिक पत्रिका ‘माणक’ जोधपुर सूं छपै। जोधपुर सूं निकळण वाळी पैली केई पत्रिकावां ही। इण श्रृंखला मे ‘माणक’ सै सूं आछी अर नुंवै सिरजण री इण घड़ी सूं जुड्योड़ी नुंवी चलगत री अेक कड़ी है।

 

इण सूं पैली जोधपुर रियासत सूं दूजै महाजुद्ध रै बखत 'बळ’ लड़ाई रा सांचा समाचार छापौ मारवाड़ी में निकळ्यौ। जय-नारायण जी व्यास ‘आगीवाण’ नांव सूं छापौ निकाळ्यौ। लाडनूं वाळा श्रीमंत कुमार व्यास 'मारवाड़ी' नाम सूं छापौ निकाळ्यौ। श्री पारस अरोड़ा ‘जाणकारी’ रा दरसण कराया। पण आज इण विज्ञान रै जुग में राजस्थानी भाषा रै विगसाव खातर ‘माणक’ सांचै सूरज री भांत राजस्थानी संस्कृति रौ चांदणौ फैलाय रैयी है।

 

श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : ‘माणक’ रै मारफत राजस्थानी रा हेताळुवां खातर आपरौ संदेश?

 

नानूराम संस्कर्ता : राजस्थान प्रदेश घणौ बड़भागी है जिण री मायड़ भाषा राजस्थानी में ‘माणक’ जैड़ौ मासिक छपै। संवेदणशीळ समाज रै अगुवै हरेक वर्ग सूं म्हारौ संदेश ई नीं, विणती है के वे राजस्थानी साहित्य री होवै ज्यूं ई, बण पड़ै जिसी सेवा करै। आपरी साहित्य संस्कृति जैड़ी अमोलक थाती नै संभाळ राखण खातर तन-मन-धन सूं सैयोग करणौ चाईजै। देस रा मौजीज सत्ताधारी, सरकार अर व्यापारी इण काम में आगै आवै।

 

समाज सेवी कार्यकर्ता, कर्मचारी, अधिकारी, लेखक, प्रकाशक, विद्वान, मोट्यार, विद्यार्थी, अध्यापक वर्ग, प्रवासी, फिलम वाळा सब मायड़ भाषा री सेवा करै। ‘माणक’ वर्ग जिसा साहित्यिक अर सांस्कृतिक प्रयासां नै आगै बढ़ावण में सहायता करै। राजस्थानी भाषा नै पढण अर बोलण रौ अभ्यास करै। मातृभाषा राजस्थानी रै अणगिणत लाडलां में सूं अेक-अेक कर ई की सांचा मातृभक्त निकळ आवै तो राजस्थानी साहित्य रौ महतब घणौ बढ सकै—

 

नांव रहंदा ठाकरां,
नाणां नाय रहंद।
कीरत हदां कोटड़ा,
पाड़्या नांय पड़ंद॥
जस प्यारौ पुरसां जिकै,
बाणौ प्यारौ नांय।
नाणौ थिर ठहरै नहीं,
जस जुग-जुग रह जाय॥

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : नानूराम संस्कर्ता सूं श्री लक्ष्मीकान्त व्यास री बंतळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन
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