राजस्थानी तो अेक अभियान छै
हाड़ौती अंचल रा राजस्थानी लेखक प्रेमजी प्रेम रौ जनम कोटा जिलै रै घघटावा गांव में 1 मार्च 1943 नै हुयौ। राजस्थान विश्वविद्यालय सूं आप हिन्दी अर अंगरेजी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि हासल कीवी। आजकल आप हाड़ौती साहित्य में सोध करै है।
आपरी राजस्थानी में अबार तांई 7 पोथ्यां प्रकासित हुय चुकी है, जकी के इण भांत है—'चमची' (1973), 'सांवळौ सांच' (1976), 'सूरज' (1978, 'सरवर', 'सूरज अर संझ्या' (1971) अर 'म्हूं गाऊं मन नाचै' (1985) काव्य में पोथ्यां, 'सेळी छांव खज्यूर की' (1975) उपन्यास अर 'रामचंद्रा री रामकथां' (1976) कहाणियां री पोथी। इणरै अलावा सतरंगी चामल दुमाही पत्रिका रौ संपादन ई कर्यौ।
आपनै केई पुरस्कार अर सम्मान मिल चुक्या है अर आपरौ जुड़ाव ई केई साहित्यिक संस्थावां सूं रैयो है।
प्रेम भावुक : हाड़ौती में राजस्थानी आंदोलन आप लोग कश्यां चलावौ छौ?
प्रेमजी ‘प्रेम’ : चलावा की जरूरत ई न्हं पड़ै। यो तो आपूं आप चाल रह्यौ छै। पैदा होती बाळक कशी भाषा में रोवै छै, कुण बता सकै छै? पण तुतलातौ बाळक जी बाणी में बतळावै छै, सब जाणै छै। हाड़ौती का बाळक हाड़ौती की जबान में ई बोलबौ सीखै छै। वा जबान सूर्यमल्ल की जबान छै। सूर्यमल्ल की जबान कांई छै, सब जाणै छै। हाड़ौती में राजस्थानी का आंदोलन की भी या ई हालत छै। लोग आपणी बाणी कै तांई अपणी मां की नांई मानै छै। हां, आंदोलन की बात आप करौ, तो म्हूं या बात बता सकूं छूं के हाडौती में जनजागरण कवि-सम्मेलण कर कर’र अठी का रचनाकारां नै दस बरस तांई राजस्थानी कौ शंख फूंक्यौ छै लोगां का मनमें हाड़ौती क्षेत्र में अपणी भाषा कै तांई सबसूं ऊंची मानबा की ललक जागी छै। लोगां नै जनगणना में अपणी भाषा राजस्थानी मंडवाई छै। ईं सूं जादा कांई हो सकै छै।
प्रेम भावुक : राजस्थानी भाषा अर राजस्थानी लोगां कै खातर दूसरा लोग भांत-भांत की बातां करै छै। आप कै पास यां बातां कौ कांई जवाब होवै छै?
प्रेमजी ‘प्रेम’ : घणी सारी बातां अशी होवै छै ज्यां कौ जवाब देबौ सवाल उठावणियां लोगान की नांई ओछापण ई मान्यौ जावै छै। अश्या ओछापण में पड़बौ राजस्थानी रचनाकार कै तांई आछ्यौ न्हं लागै। म्हां की धरती कौ इतियास छै। भूंडी बातां करबा हाळा लोगां सूं लड़बा में अर वां कै तांई पटकी मार देवा में म्हांनै ई मजौ आवै छै। मीरां की बाणी में मिठास होवै छै। जबर कै तांई पी-पी’र जीबा की कला राजस्थान आछी तरां जाणै छै। म्हां तो अमरत परोसां छां।
प्रेम भावुक : आप जद राजस्थानी साहित सूं जुड़्या, तो लोगां नै कांई सोची, कांई करी?
प्रेमजी ‘प्रेम’ : म्हारी तारीफां करीं, म्हारी भलाई सोची। जे वे या बात न्हं सोचता तो राजस्थानी साहित में म्हारी अतनी किताबां कश्यां आती?
प्रेम भावुक : कांई आप भी या सोचौ छौ के राजस्थानी भाषा में धड़ाबंदी होबा लाग री छै?
प्रेमजी ‘प्रेम’ : जठी-जठी गुड़ दीखै छै, मांख्यां भागै छै। जद-जद भी स्वारथ ले’र लोग राजस्थानी सूं जुड़्या, वांनै अश्यौ वातावरण बणायौ, जीं में धड़ाबंदी नजर आवै। पण अभियानां में यो कुविचार कोई का मन में आयौ होवै, म्हारै देखबा में न्ह आई। राजस्थानी तो अेक अभियान छै।
प्रेम भावुक : आपका सबसूं आदरजोग कवि कुण छै?
प्रेमजी ‘प्रेम’ : राजस्थानी अभियान सूं जुड़्या सारा ई लोग म्हारा आदरजोग छै। अेक-दो नांव गणबा सूं म्हैं म्हारा मन की बात न्हं बता सकूं। म्हारौ आदर्श छै—‘पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई माय।'
प्रेम भावुक : ‘आप तो राजस्थान साहित्य अकादमी’, ‘राजस्थानी भाषा साहित्य संगम’, केन्द्रीय ‘साहित्य अकादमी’ की राजस्थानी सलाहकार सभा अर ‘राजस्थान संगीत नाटक अकादमी’ रा सदस्य रह चुक्या छौ। आप संस्थावां की तथाकथित राजनीत कै बाबत कांई कहबौ चावौ?
प्रेमजी ‘प्रेम’ : आपनै ‘तथाकथिक’ शब्द कौ प्रयोग आछ्यौ कर्यौ। पण ई नै आप तथाकथित राजनीत मत मानौ। राजनीत होवै के स्वारथनीत, संस्थावां में कोई-न-कोई बदनीत जरूर काम करै छै। पण जद संस्थावां सूं जुड़्या लोग अेक जाजम पै बैठै छै तो ईं ‘नीत’ की धज्यां उडज्या छै। कतना ई सूरमा आया। संस्थावां में अपणौ-अपणौ जोर अजमा’र चलीग्या। पण संस्थावां कौ भलौ कांई होयौ! अेक भलाई होई? संगीत नाटक अकादमी पूरा राजस्थान रा संगीत, नाटक अर नृत्य की खातर काम करै छै। पण बजट का नांव पै साल भर का च्यार लाख रप्या ई मलै छै। नागी कांई धोवै अर कांई नचोवै? तो भी लोग लड़ै छै। सरकार सूं तो न्हं लड़ै के बजट बधावौ। मध्यप्रदेश में अतना बजट का तो पुरस्कार बंट जावै छै। राजस्थान में रामजी की रजा छै। पण लड़ाई कुण उठावै? राजस्थानी भाषा की मान्यता का मौलिक सवाल कै तांई प्रदूषित बताबा हाळा लोग सीकार सूं आमा सामा कश्यां हो सकै छै? सवाल अकादम्यां कौ कोई नहं। सवाल तो आदम्यां कौ छै।
प्रेम भावुक : आपनै राजस्थान सूं बारै कतनी अकादम्यां देखी, आपकौ कांई अनुभव रह्यौ?
प्रेमजी ‘प्रेम’ : केरल, तमिळनाडू, आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जश्या राज्य देखबा कौ म्हांरौ तांई सौभाग्य मल्यौ। राजस्थान सूं जादा कला अर साहित्य की सरकारी उपेक्षा म्हारै तांई कठी भी न्हं दीखी। तेलुगु, बांग्ला, तमिळ, मलयाळम की समृद्धि कौ कारण अेकली जनता ई कोई न्हं, राजकाज करणी सरकारां भी छै। सरकारां नै कोरा नाच-गाणा कै तांई संस्कृति अर कविताबाजी कै तांई साहित्य समझबा की प्रवृति जीं-जीं राज्य में उतार फांकी, ऊं ई राज्य में कला अर साहित्य कौ विकास होतौ चलीग्यौ। राजस्थान सूं पाछै कोई भी कोई न्हं।
प्रेम भावुक : राजस्थानी की अेकरूपता अेक लूंठौ सवाल मान्यौ जावै। आप कांई सोचौ?
प्रेमजी ‘प्रेम’ : भांत-भांत रा रंग-रूप का देस में यो सवाल राजस्थानी के सामै ई क्यूं कर्यौ जावै छै? हिंदुस्तान की अशी कशी भाषा छै जी की अेकरूपता पै नीं आंगळी उठाई जा सकै छै। कांई अेकली राजस्थानी ई? म्हं तो मानूं छूं के जे लोग राजस्थानी भाषा अर राजस्थानी सस्कार कै तांई भीतर सूं न्हं जाणै वे ई लोग अश्या सवाल उठा-उठा’र हिन्दी की आदि भाषा राजस्थानी की मान्यता का सवाल कै तांई दूसरी बातां कै पींदै दाब देबौ चावै छै। सवाल उठा’र सवाल कै तांई दाब देबा की नीयत की तारीफ म्हूं कश्यां करूं? राजस्थानी भाषा में अेकरूपता न्हं होती तो मारवाड़ की बात कै तांई हाडौती का लोग कश्यां समझता। अर जे न्हं समझता तो राजस्थान कौ इतियास अश्यौ न्हं होतौ जश्यौ आज छै। भाषा कै तांई भरम सूं जोबड़ौ म्हारी जाण में समझ्या-सांट्या लोगां की साजिश छै। अेकरूपता अब सवाल कोई न्हं, भरम छै।
प्रेम भावुक : आप राजस्थानी कविता, गजल, कहाणी, उपन्यास तो मांडौ छौ, नाटक क्यूं न्हं मांडौ? आपकै तांई तो ‘आल इंडिया आर्टिस्ट अेसोसियेशन’ नै श्रेष्ठ निर्देशक अर श्रेष्ठ लेखक को भी ईनाम दे’र सम्मानित कर्यौ छै। फेर क्यूं?
प्रेमजी ‘प्रेम’ : सोच की अेक सीमा होवै छै। म्हूं न्हं जाणू के नाटक सोचती बगत म्हारी भाषा हिन्दी ई क्यूं बणज्या छै। जी भाषा में सोच उपजै है, ऊं में मांडणौ पड़ै छै।
प्रेम भावुक : आपकी काम करवा की शैली अर समय?
प्रेमजी ‘प्रेम’ : काम करबा कौ कोई बगत न्हं होवै, चालतां-चालतां कविता जनमै छै। मांडता-मांडतां कहाणी होज्या छै। दन में चौदा-पंद्रा घंटा काम करबौ काम करबौ म्हारी आदत छै। ऑडिट की नौकरी तड़कै आठ बज्यां तांई बजाणी पड़ै छै। छह बज्यां सूं आठ बज्यां तांई कविया, लेखकां, नाटककारां अर अखबार हाळां सूं गप्पा ठोकबा में बगत कटज्या छै। भोजन कर्यां पाछै अेक-डंड घंटौ पत्रिकावां अर पोथ्यां की खास बातां बांचबा में बीतज्या छै। अर बज्या-खुच्या बगत में टाइपराइटर में बैठ जाऊं छं, टाइपराइटर पै ज्यो भी मंड न्या छै, वा कहाणी, लेख बणज्या छै। आधी रात सूं हली म्हूं न्हं सोऊ। सनीमौ देख्या बरस बीतग्या। थावर-दीतवार हाड़ौती ढलाका में जावा अर दखवा का कार्यक्रम चालै छै। कवि सम्मेलण में छूट्यां कौ सत्यानाश हो ज्या छै।
प्रेम भावुक : अर फेर घर?
प्रेमजी ‘प्रेम’ : रामजी की रजा छै। परिवार हाळा नै म्हारौ नांव अपणी लिस्ट सूं काट राख्यौ छै। सारौ काम घर का लोग करै छै, आपणै तांई घर की आडी सूं पूरी छुट्टी छै। वां कौ अहसान कद चुकाणौ पड़ैगौ, राम जाणै।
प्रेम भावुक : ‘माणक’ कशीक लागै छै?
प्रेमजी प्रेम : म्हारा मन सूं पूछौ अर के म्हारा घर सूं पूछौ। म्हूं तो ‘माणक’ री लार जुड़्यौ छूं। म्हारा मन की बात तो आछी ई होवैगी। पण जद ‘माणक’ आवै छै तो घर में खींचताण माच जावै छै। सब बोलै छै के वौ जोरदार छै, तो जरूर जोरदार ई होवगी। म्हनै तो ‘माणक’ अपणा ई अभियान जशी लागै छै। अभियान में बुराई जादा दीखै छै अर आछी बातां पै नजर कम जावै छै। हां, अेक बात जरूर छै के ‘माणक’ का अब तांई का सारा अंक म्हारै पास धर्या छै आप खुद ई सोचल्यौ, ‘माणक’ कशीक लागै छै?
प्रेम भावुक : ‘माणक’ में आप कांई तब्दीली चावौ छौ?
प्रेमजी ‘प्रेम’ : सबकौ काम अपणी सीमा में होवै छै। ‘माणक’ अपणी सीमा में चाल री छै। जद सीमा टूटैगी तो तब्दीली का सुझाव भेजूंगौ। पदमजी का कागद बार-बार आवै छै, और कांई करां! म्हूं जबाब न्हं द्यूं, क्यंकै ज्यों करणौ चाइजे वे कर र्या छै। ‘माणक’ अेक संपूर्ण पत्रिका छै। संपूर्ण राजस्थानी पत्रिका।