ओ धन पाछौ हाथ नीं आवणौ है

श्यामसुंदर भारती : राजस्थानी साहित्य, खासकर कविता कांनी आपरी रुचि किंयां होई?

 

नारायणसिंह : राजस्थानी साहित्य कानी म्हारी रुचि रौ सब सूं बडौ कारण राजस्थानी संस्कृति सूं म्हारौ गैरौ लगाव है। म्हांरै गांव में जिकौ सांस्कृतिक वातावरण म्हनै देखण नै मिळियौ, उण सूं म्हारौ बाळपण प्रभावित रैयौ। इण रै अलावा म्हारा पिताजी री राजस्थानी काव्य में अणूंती रूचि ही। केई जूनी कवितावां वां नै कंठस्थ ही। कैवण रौ मतळब औ के म्हारा तो संस्कार ई इण भांत बणिया के कविता म्हारै हियै उतरती गई।

 

श्यामसुंदर भारती : कविता लिखणी आप कद सूं सरू कीनी अर कुणसा कवि आपरी प्रेरणा रा स्रोत रैया?

 

नारायणसिंह : कविता लिखणी म्हैं 1948 रै लगै-टगै सरू कीनी। अबै, जठां तांई प्रेरणा रौ सवाल है—यूं तौ सगळौ प्राचीन राजस्थानी काव्य ई म्हनै प्रभावित करतौ रैयौ है, पण खासकर राजिया अर चकरिया रा सोरठा अर इसी ई दूजी रचनावां म्हनै घणी पसंद आवती। आं रै अलावा हिन्दी में प्रसाद, मीरा, सूरदास इत्याद कवि म्हनै घणा प्रभावित करता रैया है। म्है आं नै भणतौ-गुणतौ रैयौ अर कविता रै प्रति म्हारौ रुझान बधतौ रैयौ।

 

श्यामसुंदर भारती : सरू में आपरी कवितावां तुकान्त रैई। पछै आप अतुकान्त कवितावां लिखणी सरू करदी, जिकौ आज तांई लिख रैया हौ, इण लारै कांई कारण रैया?

 

नारायणसिंह : नीं, सरू री कवितावां तुकान्त नीं ही। पण म्हैं आ कैय सकूं के जठां तक म्हारी जानकारी है, राजस्थानी में सब सूं पैली ‘ब्लैंक वर्स’ री रचनावां म्हैं ई कीनी। म्हनै याद है के 1949 में म्हैं अेक कविता लिखी ‘विधवा’, आ कविता छपी तो केई बरस पछै, पण आ कविता मुक्त छंद में है अर ‘जीवण धन’ कविता संग्रै में छपी है। जठां तांई तुकान्त अर अतुकान्त कवितावां लिखण रौ सवाल है, तौ म्है अबार ई दोनूं भांत री कवितावां लिखूं। जिस्यौ विषय होवै अर जिस्या भाव उपजै, विसी ई रचना बण जावै। कविता रौ तुकान्त के अतुकान्त होवणौ इत्तौ महताऊ कोनी है।

 

श्यामसुंदर भारती : आपरी कवितावां पढतां लागै के आपरै अनुभव रा पख न्यारा-न्यारा है। 'सांझ' में प्रकृति चित्रण, ‘दुर्गादास’ में इतिहास पुरूष री सबळाई, तो 'मीरा' में प्रेम भावना। ‘बरसां रा डीगोड़ा डूंगर लांधिया’ में तो डूंगर कान्त कोमल होयग्या। अठा तांई के आपरै नुंवै कविता संग्रह ‘मिनख नै समझावणौ दोरौ’ रै तहत आप कांई कैवणी चावौ?

 

नारायणसिंह : इण बाबत तौ अी ई कैणौ ठीक रहसी के म्हारै कवि रै अनुभव रौ छेतर विस्तृत है। म्हारी प्रेरणा अर म्हारौ भावबोध किणी सींव में बंध्योड़ौ नीं है। म्हारौ तो मानणौ है के किणी कवि नै अेक धारा के अेक सींव में बंधणौ नीं चाईजै। म्हारी न्यारी-न्यारी अनुभव वाळी कवितावां लारै आ ई बात है।

 

औरूं अैड़ौ है के समै रै साथै अनुभव बधता रैवै। जीवण री जिकी वास्तवकिता है, वा केई-केई रूपां में सामी आवै। आज रौ मिनख कोरी भौतिक प्रगति री दौड़ लगा रैयौ है अर आपरी सांस्कृतिक विरासत अर मिनखपणै नै भूल रैयौ है। इणी बात री चिंता म्हारै नुंवै कविता संग्रह (मिनख नै समझावणौ दोरौ) में है।

 

श्यामसुंदर भारती : आपरी औरूं कुणसी रचनावां प्रकाशन खातर त्यार है?

 

नारायणसिंह : दो काव्य संग्रह छपै जितरी कवितावां अबार ई त्यार है, जिकौ बखतसर छपसी।

 

श्यामसुंदर भारती : आपरी चावी कृति ‘दुर्गादास’ बाबत आप कीं कह्सयौ?

 

नारायणसिंह— दुर्गादास म्हारी अतुकान्त रचनावां में अेक महताऊ कृति है। उण रौ अेक्कानी राजस्थान री वीर परम्परा सूं जुड़ाव है, तो दूजी कानी आ रचना उण परम्परा सूं मुक्त है। आ रचना राजस्थानी में अेक नुंवी अभिव्यक्ति-क्षमता री थरपणा करै। इण रै साथै ई आ बात सिद्ध करै के राजस्थानी में बिंब विधान कम सूं कम शब्दां में कितरौ सार्थक नै पूरी सबळाई साथै हो सकै। किणी वीर पर सैकडूं पाना लिख’र ई शायद उण बाबत आ व्यंजना नीं दी जा सकै, जिकी दुर्गादास में आई है। म्हारी जाण किणी अच्छी कविता री सार्थकता ई आ ई है।

 

श्यामसुंदर भारती : डिंगल रै प्रभाव रै कारण आपरी रचनावां घणी कठिण लागै। आम आदमी समझ नीं सकै। इसी आम धारणा है?

 

नारायणसिंह : बात आ है कै असल में लोग राजस्थानी री पूरी काव्य परम्परा सूं वाकिफ नीं है। हरेक भाषा री आपरी अेक परम्परा होया करै। उण में कविता रौ डिक्सन पनपिया करै। किणी रचना नै सबळ अर अर्थपूरण बणावण खातर केई बार उण डिक्सन रौ प्रयोग जरूरी हो जावै क्यूं के कवि रै भावबोध री जड़ां संस्कृति में इतरी गैरी होवै के उण रौ रंग लावण वास्तै भाषा री परम्परा नै छोड’र नीं चाल्यौ जा सकै। पण इण रौ मतळब औ नीं है के ठेट डिंगल रौ मोह राख्यौ जावै। हां, सहज भाव सूं इण भांत रा शब्द म्हारी कविता में अर्थगांभीर्य है, जिण नै समझण खातर वैड़ौ ई मानस पाठक रौ होवणौ जरूरी लखावै। हळकी-फुळकी के महज आमोद-प्रमोद वास्तै कविता लिखणौ साचै कवि रौ धरम कोनी...वो अेक सर्जक है अर उण री सिरजणा सबळी नै काळजयी तद ई होवै, जद उण में व्यंजना री गैराई होवै।

 

श्यामसुंदर भारती : मंचीय कवितावां लोगां तांई सहज पूग सकै अर कविता कानी लोगां री रुचि बध सकै, इण बाबत आपरा कांई विचार है?

 

नारायणसिंह : मंचीय कवितावां तौ लोग मंच नै दीठ में राख’र ई लिखै। उण में भावबोध री अर्थ व्यंजना बारीक अर आपरी काव्यात्मकता रै साथै नीं आ सकै। इण वास्तै मंचीय कविता में म्हारी रुचि नीं रैई।

 

मंचीय कवियां रौ लोगां नै प्रभावित करण रौ आपरौ अेक ढंगढाळौ है, जिण सूं वे आपरौ मकसद पूरौ करै पण इण सूं वे कवितावां महताऊ नीं बण सकै अर उण जुग रै साथै ई खतम हो जावै। आजकल तौ मंचीय कवितवां लोगां रै आमोद-प्रमोद रौ साधन बणगी है। इण नै कवि कर्म री संज्ञा देणी ठीक नीं।

 

श्यामसुंदर भारती— चौपासणी सोध संस्थान री थरपणा अेक महताऊ काम हुयौ। इण बाबत आपरै मन में विचार कद अर कियां आयौ?

 

नारायणसिंह— चौपासणी सोध संस्थान री थरपणा 1955 में होगी। उण बगत चौपासणी शिक्षण समिति रा अध्यक्ष मैजर (डॉ.) भैरू—सिंह जी खेजड़ला, विजय सिंह जी सिरियारी अर शाह गोरधन लाल जी काबरा रै मन में इण भांत रौ विचार आयौ के चौपासणी में राजस्थानी संस्कृति बाबत ई कीं काम होवणो चाइजै? इण खातर—क्यूं के म्हैं उण बखत तांई राजस्थानी में खासौ सिरजण कर चुक्यौ हौ, वां म्हां सूं संपर्क कियौ अर म्हैं म्हारी केवावां देवण खातर हांमळ भरली, क्यूं के म्हारौ राजस्थानी साहित्य अर संस्कृति सूं गैरौ लगाव हौ।

 

श्यामसुंदर भारती— संस्थान री शोध पत्रिका ‘परम्परा’ रौ प्रकासण कद सूं सरू होयौ अर इणरा कलेवर नै लेय’र आपरी संपादकीय दीठ लारै किण भांत रा विचार रैया?

 

नारायणसिंह—संस्थान री ‘परम्परा’ सोध पत्रिका रौ प्रकासण संस्थान री थरपणा रै साथै सरू होयौ। इण नै लेय’र सरू सूं म्हारौ ओ विचार रैयौ के आ पत्रिका इस्यी होवणी चाइजै के भारत री दूजी सोध पत्रिकावां सूं आपरी न्यारी ओळखाण राखै। इण रै तहत राजस्थानी साहित्य अर सोध रो कीं ठोस अर महताऊ काम होवै। इण बात नै दीठ में राखतां सरू सूं हरेक अक विशेषांक ‘प्लान’ करीज्यौ। विशेषांकां री आ परम्परा आज तांई चाल रैयी है। अबार तांई 75 भाग प्रकाशित होय चुक्या है। इण रा हर भाग में किणी अेक विषय नै लेय’र घणकरा विद्वाना रा लेख छपिया है। प्राचीन राजस्थानी साहित्य री महताऊ कृतियां ई संपादित प्रकाशित की जावै। इण काम नै ढंगसर अंजाम देवण खातर संपादक नै सरूपोत सूं आखिर तांई घणौ पचणौ पड़ै। पण बिना आथड़ियां ठोस काम सामी कियां आ सकै। आ ई वजै है क राजस्थानी साहित्य री किणी ई विधा पर शोध करणियै विद्यार्थी नै ‘परम्परा’ रा अंक देखणा लाजमी हो जावै। मतळब क ‘परम्परा’ देश री शोध पत्रिकावां मे आपरी ठावी ठौड़ राखै।

 

श्यामसुंदर भारती— कांई शोध पत्रिका रै अलावा औरूं ई कोई प्रकासण संस्थान रै तहत होवै? औरूं कुणसा काम संस्थान रै हाथां में है?

 

नारायणसिंह— संस्थान रै तहत करीब 17 हजार ग्रंथां रौ संग्रह लारला 30 बरसां में करवायो गयौ है। वां री सूची ई प्रकाशित हो रैयी है। पांच भाग तौ छप ई चुक्या है। डिंगल रा महताऊ कवियां री सूची ई प्रकाशित करीजी है। आं रै अलावा संस्थान हर बरस चावा विदवानां रा भाषण अर संगोष्ठियां रौ आयोजन ई करै अर वां भाषणां नै प्रकाशित करावै। संस्थान रै तहत जितरौ महताऊ काम राजस्थानी साहित्य रौ हो रैयौ है, उत्तौ ई काम इतिहास संबंधी ई हो रैयौ है। ओ संस्थान जोधपुर विश्व विद्यालय सूं मान्यता प्रापत् शोध केन्द्र है, इण वास्तै राजस्थानी साहित्य अर इतिहास रा शोध विद्यार्थी म्हारै निर्देशन में विधिवत शोध काम ई करै ‘राजस्थानी सबद कोस’ ई संस्थान रै त्हैत ई धपियौ है।

 

श्यामसुंदर भारती— संस्थान रै विकास खातर आगै कुणसी योजनावां है?

 

नारायणसिंह : बात आ है के संस्थान रा आर्थिक साधन सीमित है। तो ई इण रै विकास री केई योजनावां है। ज्यूंकै संदर्भ पुस्तकां रै पुस्तकालय री बढोतरी करणी। महताऊ ग्रंथां री माइक्रो-फिल्मिंग करावणी। शोध विद्यार्थियां नै बत्ती सुविधावां दिरावणी इत्याद खास है।

 

श्यामसुंदर भारती : राजस्थानी री अेकरूपता बाबत कुणसा प्रयास किया जाणा चाइजै, जिणसूं के इणरो अेक टकसाळी रूप बण सकै?

 

नारायणसिंह : राजस्थानी गद्य लेखकां री अेक संगोष्ठी बुलाई जावणी चाइजै अर उण में राजस्थानी साहित्य री व्याकरण अर कीं मुद्दौ तै कर लेवणा चाइजै। पछै सगळा लेखक उण निरणै पर द्रिढ रैय’र चालै तौ जिकौ थोड़ौ बौत छेत्रीय फरक लिखावट में आवै वौ धीरै-धीरै मिट सकै। इण में दैनिक अखबार ई कारगर भूमिका निभा सकै। अे लूंठा काम जित्ता बेगा होसी उत्तौ ई बेगौ राजस्थानी भाषा रौ उत्थान होसी भाषा रै उत्थान खातर ओ घणौ जरूरी है।

 

श्यामसुंदर भारती : ‘माणक’ पत्रिका बाबत आप रा कांई विचार है?

 

नारायणसिंह— ‘माणक’ पत्रिका आपरै ढंग सूं राजस्थानी री लूंठी सेवा कर रैयी है। खासतौर सूं राजस्थान वासियां नै ई नीं पण प्रवासियां नै ई आ आपरी धरती नै सांस्कृतिक गरिमा री याद दिरावै। नुंवा लेखकां नै प्रोत्साहन देवै अर राजस्थानी साहित्य रै प्रचार में घणी मदद करै...

 

‘माणक’ राजस्थानी साहित्य री अेकरूपता खातर महताऊ भूमिका निभा सकै। राजस्थान वासियां अर प्रवासियां नै आ बात भलीभांत समझ लेवणी चाइजै के जे आपां आपांरी संस्कृति अर पिछाण नै बणाई राखणी चावां तो राजस्थानी भाषा नै आपां रै वैवार में, लिखाई-पढाई में, शिक्षा अर रोजगार में सब सूं पैली महत्व देवणौ चाइजै। समय रै बहाव में जे इण धरोहर रौ धन बैयग्यौ, तौ पछौ कदै ई हाथ नीं लागणौ है। जिकौ राजस्थान अर राजस्थानी साहित मध्यकाल में पूरी भारतीय संस्कृति री रक्षा करी, वौ ई राजस्थान अेक निबळाई रौ जीवण जी'ण वास्तै मजबूर हो जासी।                                                                     

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : नारायणसिंह भाटी सूं श्याम सुंदर भारती री बंतळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन
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