राजस्थान रौ सांस्कृतिक विकास भाषा अर साहित्य माथै निर्भर
पो. नामवरसिंह ‘जोधपुर विश्वविद्यालय’ में रैवता थकां अठै रै बी. अे. अर अेम.अे रै पाठ्यकमां में क्रांतिकारी बदळाव कर्यौ। अेम. अे हिंदी रै त्हैत आप ‘सौंदर्यशास्त्र’ अर ‘राजस्थानी’ दो विकल्प राख्या जिणां में हरेक रा 3-3 प्रश्नपत्र हुवता हा। इण भांत राजस्थानी रै स्वतंत्र विभाग बणावण री दिस में आपरौ योगदान रैयौ। इणरै अलावा आप स्कूल स्तर माथै ई राजस्थानी पाठ्यकम सरू करण सारू जतन कर्या पण बात पार नीं पड़ी। केन्द्रीय ‘साहित्य अकादमी’ सूं राजस्थानी नै मान्यता दिरावण में ई आपरी महताऊ भूमिका रैयी। जोधपुर रैवास रै दौरान आप अठै रै हिंदी, राजस्थानी अर उर्दू रै लेखकां सूं बराबर जुड़्या रैया अर अठै रै साहित्यिक कार्यकमां में ई बरौबर हिस्सौ लेवता रैया।
कीं बगत पैली ‘सांप्रदायिकता अर साहित्य’ व्याख्यान रै सिलसिलै में आपरौ जोधपुर पधारणौ हुयो तो देस रै मौजूदा हालात माथै कीं बातचीत हुई। जुगल परिहार री कर्योड़ी वा बातचीत ‘माणक’ रै पाठकां सामी—
जुगल परिहार : ‘साम्प्रदायिकता अर साहित्य’ व्याख्यान रै दौरान आपरौ कैवणौ हौ क आज ‘फिजा’ ई बदळ चुकी है, तो आ ‘फिजा’ बदळी कीकर? इणरै इत्ती जैरीली हुवण रा कांई कारण रैया?
नामवर सिंह : लारलै कीं बरसां सूं आपां बरौबर देख रैया हां के आपां रै अठै आप-आपरै धरमां री विशिष्टतावां री चरचा कीं अणूंती ई हुवण लागगी है। और तो और, धरम रै रस्तै सूं सांप्रदायिकता कानी बढण री प्रवृत्ति केई साहित्यकारां में ई साफ दीख रैयी है। ओ घोर चिंता रौ विसै है। अर इण तरै री गतिविधियां धारमिक अलगाववाद नै बढावौ दे रैयौ है। अे हालात क्यूं पैदा हुया?—इण सवाल माथै गंभीरता सूं विचार करण री जरूरत है।
दरअसल आजादी रै बाद आपां संविधान में अल्पसंख्यकां नै कीं विशेष सुविधावां दिरीजी। इणरौ नतीजौ ओ हुयौ के बगत-बगत माथै छोटा-छोटा समूह अे सुविधावां हासल करण सारू आप-आपनै अल्पसंख्यक घोषित करवावण लागग्या। वोट देवण रौ अधिकार अठै रै हरेक नागरिक नै मिल्यौ, सो वोट सूं परिचालित राजनीति इणरौ फायदौ उठावण लागी। इणसूं देस रै न्यारै-न्यारै वरगां में आरथिक असंतुलन ई पैदा हुयौ। अर आं आरथिक कारणां सूं धारमिक अलगाववाद बढण लागौ। इणरै अलावा आपां रै अठै चुणाव-प्रणाली में न्यारै-न्यारै संप्रदायां रै फगत धारमिक चिन्हा माथै इज पाबंदी राखीजी, किणी रै ई माथै नैतिक आंकस नीं राखीज्यौ। नतीजन देस में समन्वय या अेकीकरण री भावना री जगै अलगाव री भावनावां पनपी।
पैली पूजा मिनख रौ निजू कर्म हौ, व्यक्तिगत कर्म हौ। पण आज धारमिक स्थानां माथै जावण री माध्यम बणगी है। आजादी रै पैली देस में कीं खास-खास मोटा तिंवार ई मनाईजता, जियां के हिंदू लोग होळी, दीवाळी, रामनवमी अर जन्माष्टमी मनावता अर मुसळमान लोग मोहर्रम, इदुल फितर, इदुल जुहा अर ईद मिलादुल नबी। इणी भांत दूजै संप्रदायां में ई इक्का-दुक्का तिंवार मनाईजता। अर तिंवारां रै मौकै सांप्रदायिक सद्भाव अर भाईचारौ ई देखण नै मिलतौ। पण आज हालत आ है के देखा-देखी न्यारै-न्यारै संप्रदायां में केई नवा तिंवार पैदा हुयग्या। अर सगळा राष्ट्रीय स्तर माथै मनाईजण लाग्या। इणरै बाबत तर्क ओ इज दिरीजै के इणसूं कोई पचड़ौ नीं पड़ै।
अर पछै आं परब-तिंवारां नै संचार माध्यमां रौ पूरौ-पूरौ सहारौ दिरीज्यौ। आ ई नीं, रेडियो- टी.वी. रै साथै-साथै पत्र-पत्रिकावां में ई अे महत्वपूरण बण’र स्थान पावण लागा। इण सगळी बातां सूं समन्यव या अेकीकरण री भावना नै धक्कौ पूगौ।
इण बदळाव रौ खास अर बडौ बिंदु रैयी अेमरजेन्सी अर उणरै तुरंत बाद बणी जनता सरकार। जनता सरकार रै बाद आरथिक संकट रै साथै-साथै राजनीतिक संकट ई गैरौ हुयौ। लोगां में जद असुरक्षा री भावना बढी तो वे धरम रौ सहारौ लेवण लाग्या।
अर धरम रै नांव माथै चुणाव ई लड़ीजणा सरू हुयग्या। इण भांत आ लारला कीं बरसां में देस में जका हालात पैदा हुया, अैड़ा पैला कदैई नीं रैया।
जुगल परिहार : फिज़ा में घुळ्यै इण जैर रै प्रभाव में केई साहित्यकार ई आयग्या—इण बाबत आप खुलासेवार बतावौ के आ बात कीकर हुई?
नामवर सिंह : दरअसल आज जैड़ा हालात पैली कदैई देखण में नीं आया। लारलै अेक दशक या उणसूं कम बगत मे फिज़ा में इत्तौ ज़ैर घुळग्यौ है के वे लोग, जिणां रै बारै में कदैई शंका नीं हुई, उणां रै माथै सूं अर उणां रै लेखन माथै सूं विसवास उठ रैयौ है। आज हिन्दी में हिन्दू लेखकां री घणकारी तादाद नवै सिरै सूं हिन्दू हुय रैयी है, अर मुलळमान जका के हिन्दी या उर्दू लेखक रै रूप में जाणीजता, आज बेसी मुसळमान हुवता जा रैया है। जदकै पैली फगत हिन्दी लेखक या उर्दू लेखक रै रूप में ओळखीजता। आ स्थिति बौत ई खतरनाक है।
हिन्दी अर उर्दू दोनां रै ई साहित्यां री आप-आप री लंबी परंपरावां रैयी है। अर दोनां में ई मानव-प्रेम री धारा ई मुख्यधारा रैयी है। दोनूं ई भाषावां में अनेकूं अैड़ा लेखक हुया, जका के इण धारा नै लगौलग प्रवाहशील बणाई राखी। पण आज मानव प्रेम री वा मुख्य धारा ई सांप्रदायिकता रै ज़ैर सूं ज़ैरीली हुय रैयी है।
आज लेखकां रै इण भांत बदळतै रूप नै देखां तो इचरज तो हुवै ई, साथै ई डर ई मैसूस हुवै।
''धर्मबद्धता अर धर्म निरपेक्षता' दोनूं ई बेमानी है'' कैवण वाळा निर्मल वर्मा आज कैवै कै—हिन्दू धरम सगळै गुणां री खान है, हिन्दू सांप्रदायिक नीं हुय सकै—तद अचंभौ हुवणौ सुभाविक है। अर इणसूं ई बेसी अचंभौ तद हुवै जद घणकरी अभारतीय परिवेश रौ साहित्य रचण वाळां निर्मल वर्मा प्रयाग रै कुंभ मेळै री भीड़ में भटकै। इण भांत जद राष्ट्रीय स्तर रा सम्मानित अर प्रतिष्ठित साहित्यकार हिन्दुत्व अर इस्लामियत रौ आग्रह करण लागै तो दहशत मैसूस हुवै।
अेक कानी जठै इण तरै री बातां हुय रैयी है, दूजी कानी आपां रै देस में इण तरै रे कामां में सरकारी पइसौ खुल'नै खरचीज रैयी है। कबीर, जायसी, प्रेमचंद इत्याद रै बारै में राष्ट्रीय स्तर रौ कोई आयोजन नीं, जका के सांप्रदायिकता रै खिलाफ मानवतावादी विचारां नै ई स्वर दियौ।
देस में आजादी सूं पैली ई धारमिक तणाव रैया है, पण अैड़ी स्थिति तो कदैई नीं आई। असहयोग आंदोलन रै बगत स्वामी श्रद्धानंद रै ‘शुद्धि आंदोलन’ रौ विरोध अेक अेकली आवाज रै रूप में प्रेमचंद कर्यौ हौ। आज सांप्रदायिकता अर धर्माधता रै विरोध में लिखण री हिम्मत कोई लेखक नीं जुटा रैया है, आ अेक चिंता री स्थिति है। चौफेर गैरीजतौ घोर अंधारौ देख’र ओ वैम हुवण लागै के वोट री राजनीति सूं परिचालित सत्ता अर सरकार तो कठैई आं सांप्रदायिक तत्वां नै शह नीं दे रैयी है? जे साहित्यकार इण बाबत नीं लिखै तो आ ‘बौद्धिक बेईमानी’ हुवैला। साहित्यकार नै आज असली दुस्मण पिछाणण री जरूरत है।
जुगल परिहार : आप कैयौ के सांप्रदायिकता आज विज्ञान सूं आ रैयी है—आ बात समझ में नीं आई। ओ कीकर?
नामवर सिंह : आ बात कैवण रौ म्हारौ मतलब ओ है के विज्ञान अर उद्योगां रै विकास रै साथै-साथै धरम अर संप्रदाय ई लगौलग फूल-फळ रैया है। आपां देख्यौ के 19 वीं शताब्दी में विज्ञान अर उद्योगां रै विकास रै कारण यूरोप में धरम अर चर्च कमजोर नीं हुया, विज्ञान अर उद्योगां रै विकास रै फळ स्वरूप पूंजीवादी व्यवसाय इण भांत पनप्यौ के उणरै प्रभाव सूं धर्म रौ ई व्यावसायीकरण हुयग्यौ। दरअसल पूंजीवादी व्यवस्था हरेक चीज नै ‘माल’ में बदळ दियौ है। आज मिंदरां री व्यवस्थावां अर धारमिक उच्छबां रै आयोजनां माथै इणरौ प्रभाव साफ दीखै। भगवान रा दरसण अर दूजी धारमिक सुविधावां ई आज पूंजी माथै आ’र अटकगी है।
टेक्नोलॉजी में निहित है अमानवीयकरण। टेक्नोलॉजी रौ जित्तौ बधापौ हुसी, उत्तौ ई अमानवीय करण रौ खतरौ रैसी। कंप्यूटर री बात करां, कंप्यूटर ई तो मानव निरपेक्ष है। सो आज मानवीय मूल्यां अर भावनावां सारू विकल्प री सख्त जरूरत है। मानव सारू सबसूं जरूरी है मानवीय रिस्ता अर मानसिक शांति।
आज आपां देखां के समाजवादी देसां में धारमिक संस्थावां रौ इत्तौ जमावड़ौ नीं है। जद मिनख आरथिक अर पारिवारिक रूप सूं पूरी तरियां सुरक्षित है, तो पछै वो क्यूं जावैला धरम री शरण में?
जुगल परिहार : आप भाषाविद् हौ अर अेल.पी. टेसीटोरी रै राजस्थानी व्याकरण संबंधी अेक बौत ई महताऊ निबंध रौ ‘पुरानी राजस्थानी’ रै नांव सूं अनुवाद ई कर चुक्या हौ, राजस्थानी भाषा रै बाबत आपरा कांई विचार है?
नामवर सिंह : राजस्थानी भाषा अर साहित्य सारू म्हारै मन में कांई भाव है—इणरौ अन्दाज तो आं बातां सूं ई लगायौ जाय सकै है क ‘जोधपुर विश्वविद्यालय’ में राजस्थानी विभाग म्हारी ई पै'ल माथै खुल्यौ। अर केन्द्रीय साहित्य अकादेमी में राजस्थानी साहित्य नै मान्यता दिरवावण में ई म्हैं निर्णायक भूमिका निभाई ही। जोधपुर रैवास रै दौरान म्हैं शिक्षा रै दूजै स्तरां माथै ई राजस्थानी रै अध्ययन-अध्यापन री व्यवस्था री हिमायत करी ही अर उणरै वास्तै कारगर योजना ई पेस करी ही।
आज ई, म्हारौ विस्वास है क राजस्थान रौ सांस्कृतिक विकास राजस्थान में राजस्थानी भाषा अर साहित्य री व्यापक शिक्षा माथै निर्भर है। ओ काम हिंदी रै साथै-साथै चाल सकै है अर इण प्रकिया में राजस्थानी रै साथै-साथै हिंदी ई सिमरिध हुसी। शिक्षा रै छेत्र में राजस्थानी हिंदी रौ विकल्प नीं है, आ तो हिंदी री पूरक है।
जुगल परिहार : आप राजस्थान, खास करनै जोधपुर रैया। जोधपुर रैवास रै दौरान आपनै कांई-कैड़ौ लाग्यौ? कीं रोचक घटनावां, संस्मरण, खाटा-मीठा अनुभव इत्याद आप बतावणा चावौला?
नामवर सिंह : जोधपुर रै कवियां, लेखकां, पत्रकारां, बुद्धिजीवियां अर विद्यार्थियां सूं म्हनै घणौ प्रेम मिल्यौ। प्रवास री घणकरी यादां मन में आज ई बस्योड़ी है। कीं लोगां सूं तो स्थायी रूप सूं दोस्ती रौ रिस्तौ ई बण चुक्यौ है। सगळी बातां मांड’र बतावणी आज संभव ई नीं।
हां, अेक बात आ ई बताय दूं—कीं कड़वा अनुभव ई हुया, पण आज वे ई स्वादू लागै। इण वास्तै अबै अलग सूं उणां रौ कांई जिकर! बुरौ नीं मानौ तो म्हैं ओ कैवणी चावूंला क जोधपुर बौत अच्छी जगै है, पण कीं दिनां रै वास्तै ई!
जुगल परिहार : ‘माणक’ रै बारै में आपरा विचार?
नामवर सिंह : ‘माणक’ सारू तो म्हारौ सिरफ ओ ई कैवणौ है क व्यावसायिक प्रदूषण सूं बचाइचौ अर राजस्थान रौ सांस्कृतिक उत्थान कराइजौ।