मुळकै मत मनड़ो भुळ जासी

रूपाळी, तनड़ो झुळ जासी

हिवड़ै रो चैन कठै ढूंढै

रूपां रा पागी रूळ जासी

आंगी अंगड़ावै रात ढळयां

सुपनै में कसणा खुल जासी

चटगी नटखारो, चार घड़ी

नखराळी डाळी लुळ जासी

नैणा रा मद रा अै पियाला,

किण मद छकियै मन ढुळ जासी

मोती री आब उड़ै मरवण

पणघट पर बातां खुल जासी

सौरभ रा लोभी लूट कली

डाळ्यां, पत्तां में लुक जासी

आंख्या रो झीणों काजळ

‘के हुयो’ सोचतां घुळ जासी

बुरी हेत री कस्तूरी

रग-रग में सौरभ घुळ जासी

चक-चक नीं सांपण, ‘रसिक’ मान

कोई कालबेलियो मिल जासी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : हरफूलसिंह ‘रसिक’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-14
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