तिणकलै री जो इतरी छिंयां है

तो साम्प्रत बिरछ री है वा किंयां है।

रूप री छिब भला किण भांत दीसै

खुलै नीं जड़ मनां री खिड़कियां है।

घणी गहरी रे पसरी अचपळी है

समंदर माछळयां कै आंखियां है।

पळाको-सो पड़े, दीसै नहीं है

वो उणरो रूप है कै बीजळ्यां है।

दरस नीं, परस नीं, तो छकावै

थूं है, थारै रच्योड़ी पूतळ्यां है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : रामेश्वरदयाल श्रीमाली ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन, पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-19
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