अठीनै सूं निकळसी बा, बठीनै सूं गई होगी
कई दिन बीतग्या, अै बात भी आई गई होगी
न बीं रो कुछ ठिकाणो है, न म्हारो भी ठिकाणो कुछ
आ चिड़िया प्रेम री सारी उमर उड़ती रही होगी
कठै रिपटण, कठै दळदळ, कठै अै पापड़्यां सी है
नदी मन रै मरुस्थल में कई बरसां बही होगी
तड़प री कुण परिभासा करै अर न्याय देवै कुण
न जाणै प्रेम पीड़ा किण री कुण कद सही होगी
म्हे जाणू हूं क’ म्हांसू बात आ पूरी नहीं होगी
निकळसी पण न मुंह सूं आ, क’ आ म्हांसू नहीं होगी
न बा समझी, न म्हे समझ्यो, जरा सी बात ही भांगी’
जो इक दूजै री इक दूजै नै, इक दूजै कही होगी।