सोच रो वातावरण गंदो हुयो है

आंख होतां आदमी अंधो हुयो है

पुलिस, नेता मौलवी, पंडित अर फादर

रूबरू सै कै कतल, दंगो हुयो है

देससेवा राजनेता के करैगा

राजनीति लूट रो धंधौ हुयो है

आकास पर अब कुण उछाळै पथरां नै

हौसला सैं दूर हर बंदो हुयो है

के मिल्यो कीं नै भला परिवार सूं

रिसतेदारी फरज रो फंदो हुयो है

चांदणी पर सैं की है मैली नजर

चांद खुद पर रोज सरमिंदो हुयो है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मधुकर गौड़ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-29
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