फुलबाड़्यां की ज्यान छै कनीर की कळ्यां

मन सूं मैरबान छै कनीर की कळ्यां

जीं दन सूं छूट्यौ बागां आबौ-जाबौ

सूनी छै बेरान छै कनीर की कळ्यां

म्हां सूं पूछी खुलगी’र पसब बणगी

अतनी बेईमान छै कनीर की कळ्यां

दमना क्यूं छौ थांकै घर कोई नहीं

अर म्हांकै मनमान छै कनीर की कळ्यां

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : प्रेमजी प्रेम ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : अगस्त 1986
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