मत होवै तूं डफाचूक, थारै क्यूं बापरगी भूक

नीत नेकी पर चाल रे भाया, आछो कर सैं स्यूं सलूक

सन्तोस बराबर सुख कोनी, दुख कोनी लालच सो अपार

धिंगाणै हाय धन, हाय धन करतो, कांटै जियां तूं मना सूक

हिवड़ा में हेत बसाकर के, जिवड़ा नै जगां जमां लीजे

छळ-कपट छोड़, नित सोच बोल, ऊछाळो मत थोथो थूक

मत बणजे रोहिड़ै सो फूल, दुनियां घालैली माजनै धूळ

पग-पग पर चेतो संभाळ राख, करजे कद भी ना जरा चूक

दुनियां तो ओगणगारी है, इणका चक्कर में मत पड़जे

तूं ‘श्याम’ राम मारग बगजे, बातां मत करजे ऊक-चूक

मत होवै तूं डफाचूक, थारै क्यूं बापरगी भूक।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : राधेश्याम जोशी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-33
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