किण सूं हंस पूछोला बातां

सगळा लगा रैया है घातां

उठै वतूळा मन रा मन में

कांच तूटग्यौ मन बिलमातां

किण नै पूछै राह बटाऊ

रात अठै व्हैगी अपघांतां

वैही’ज रहसी जमिया जाजम

ज्यांरै चै’रै सतरै भांतां

अबखी पीड़ अमूझ आंख्या

दांत निकाळै हंस-हंस रातां

सगळी रात अंधारै काढी

चांद ऊगीयौ सैं परभातां

कुण आंगण रो भेद बतायौ

जितरा मूंडा उतरी बातां

लूलौ व्हैग्यो आज आदमी

कैग्यो सूरज जातां-जातां।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : आईदान सिंह भाटी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 11
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