काल की चंता कांई करां

आज कठै सूं पेट भरां

बातां तो ज्याणां छां घणी

पण सामी खैबा सूं डरां

ज्यां की मूछ्यां फड़कै छी

वा बी ज्या बैठ्या छै घराँ

आज के लेखै कांई न्है खै

वे जद खै जद काल परां

वां नै कांई चंता म्हैं।

काल मरां कै आज मरां

दन दन चोटां दैर्‌यौ बगत

कण-कण रोज्यीन्यां खरां

बातां बातां उड़र्‌यी

ध्यान धरां कै कान धरां

जूना खंडर-सा अब नत की

म्हे बी चणीक-चणीक झरां

खूब भटक ल्यां मेळा मं

चाल यकीन अब चाल घरां

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : पुरुषोत्तम 'यकीन' ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 22
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