झेलै सूरज री लाय खेतां में हळ चलावै

सैवै बिरखा अर ठार खेतां में हळ चलावै

घरआळी आवै झूमती चटणी कांदा सागै

रूंख नीचै लेवै व्यामी दोपैरा रोटी खावै॥

बीज बोवै करै मेहणत राम भरोसै चालै

बिणज-बौपार नीं जाणै गीत प्रीत रा गावै

दुखड़ा भोगै अणथक फेरूं भी रैवै भूखो

साहूकार लूटै नित ही आधा टका गिणावै

धन-धन थूं किरसांण, सगळां रो पेट भरै

फेरूं भी करजदार, बिखो कुण नै सुणावै

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : विनोद सोमानी ‘हंस’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-44
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