नित रो गैला रोवै कांईं

हाथां सूं दुख बोवै कांईं

पग भर्‌यां ही छेटी मिटसी

ऊभो-ऊभो जोवै कांईं

बिन लड़्यां ही हारै है थूं

इण सूं भूंडो होवै कांईं

हक सारू लड़ मोटां सूं भी

हक मांगण सूं डरपै कांई

मनड़ै नै भी उजळो करदे

कोरो नित तन धोवै कांईं।

स्रोत
  • पोथी : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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