भौत निभी, अब भी निभरी, पण निभसी किंयां सदा,
पीवै सूरड़ा गंगाजळ अर केसर चरै गधा।
सै जाणै है धोळा बादळ, थारै मन री बात,
म्हारा बांटा रो पाणी, तू करर्यो कठै जमा।
नीम, खेजड़ा अर रोहीड़ा, मरै तिसाया, सोच,
नींतर थांरै गुलाबां माथै देसी गाज गिरा।
भरम थनै, थांरै चौगड़दै, भैळी सगळी भीड़,
सगळां रै हाथां में भाठा देसी नरक पुगा।
रीस,खीज, झाळां मरता सै मूंड हलावै लोग,
थनैं भरम है, सगळा थारै उपर हुया फिदा।
अठै सूकग्या हलक बिना पाणी, तू चरै अंगूर,
भूखा खाय तिंवाळा, तू समझै, मितवाळा वाह।
मझन जेठ में बी थारै घर, ठंड गुलाबी फाग,
ढुळै फुंवारा सावन उफणै, झूंपै घाम जमा।
म्हनै पतो नीं, काल सुण्यो तू म्हारा वोटां रो,
बणगो ठेकादार, मोकळी रकम धरी अंटा।
तेरी पंचायत में भाठा क्यूं नीं फींक्या लोग,
बण्यो बिचोलो बूढै संग दी दूध मुंही परणा।
किंकर घणो उदास आस में जी ले बिणजारा,
इण बाळद रा दिन बी कोई देसी कदै फिरा।
घड़ो पाप रो भर्यो ऊजळै, थनै नसो नीं ठा,
बेगी बळसी देख ‘रसिक’ आ सोनै री लंका।