तूं अमर सुवागण है,

थारो मंगळ-सिणगार बण्यो रैवै!

थारै मन में म्हारै खातर,

सागी प्यार बण्यो रैवै!

मैं बीण बजातो जाऊं,

गायां जाऊं अै गीत अमर!

मीठी रागां, ऊंचा सुर में,

वीणा रो तार तण्यो रैवै!

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : नवम्बर
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