बांच-बांच नै फेरूं बांचू

म्हूं जीवन री पोथी।

सगळी उमर बीतगी

थारी-म्हारी करताईं

परनिन्दा करतो स्वारथ में

फर्‌यौ आफरतां

औसर चूक हाथ मल बैठ्यो

अबै औस्था चौथी।

बालपणौ तो बालपणौ है

खेल्यौ कूद्‌यौ खायो

मस्ती-मौज मटरगस्ती रो

कदी पार आयो

सांसा रा सागर रो लाग्यो

यो मूंगो मोती।

भरी जवानी चौमासै रै

बळदां ज्यूं टांड्यौ

म्हूं चौड़ो सड़कां संकड़ी है

अस्यौ मांडणो मांड्यौ

समै सुनैरो लाग्यो बाकी

उमरां लागी थोथी।

ज्यूं-ज्यूं ढळती रई औस्था

थोड़ी समझ पड़ी

पण गिरस्थी री गाड़ी री

फांसी गळै अड़ी

छोडूं जोड़ूं करतां-करतां

हुयौ पार साठौती।

करणै-धरणै री उमरां में

जे करणी कर ज्यावै

मिनखाजूण सकारथ करले

कदै नईं पछतावै

चुगज्या चिड़ियां खेत, पछै कुण

देखी फसलां होती…!

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : भैरूलाल गर्ग ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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