अेक

भासा ही भूलग्या
म्हे
कविता री।
अेक फगत
सबदां पर
अरथा पर
टूलग्या म्हे।

ऊभ सूक ही हुग्या
पेट-पेट करता
फुरसत ही कणा मिली
भाव कीं संवरता।
जलमण सूं मरण तांईं
इण थोथै ओदर री–
फांसी पर झूलग्या म्हे।
फुरसत में पांगरती
पै’लां कीं, मै’लां में
राग-रंग, कला
जियां-जियां छुट्या बै
बियां-बियां मोखरड़ा
होता ग्या
साद, सबद
म्हारा तो, मला!
रेत रै समन्दर में
डूब्योड़ी, बेवारस
लाशां सा फूलग्या म्हे।

भासा ही भूलग्या म्हे
कविता री।


दो

हर घड़ी
अेक ही है कथा
बस बिथा ही बिथा ही बिथा!
सूळ ही सूळ
निपजै जठै
पीड़ ही पीड़
जलम बठै
फूल रै परस रा मायखा,
फेर कठै सूं उपावै मता।
धूळ ही धूळ
च्यारूं तरफ
लिखै, लूरा
वळत रा हरफ
भूख रा तिस रा जंगी सरप
बण, डसै मौत रा देवता।
सबद,
सुख रा अनै छांव रा
सबद,
संयोग रै नांव रा
म्हे उपाया नीं, इण गांव रा
मूढ़, गूंगा, अनै बेर्‌यां।
हर घड़ी
अेक ही है कथा
बस बिथा ही बिथा ही बिथा।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मोहन आलोक ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 13
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