जीवण रो गीत

म्हैं रऊंगो पण जीवण

गीत सदां मुळकावैगो,

सांसां रो सरगम बैं नैं ही

हर जुग में दोहरावैगो।

खुसियां री आदत है बणकर

पून सदा सूं चालै है,

और दरद री बेचैनी नै

चायै जद ही सालै है,

ऋतुवां रै उजळै तन पर

आ, सावण रस बरसावैगो।

इच्छावां रै राजमहल में

सुपनां रो उत्सव होवै है,

पण रंग-बिरंगै छण

में, उजियाळौ छुप कर सोवै है,

कोई पळ गूंथ्यैड़ो भय सूं

कोई पळ खिल ज्यावैगो।

म्है रऊंगो पण जीवण

गीत सदां मुळकावैगो॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मधुकर गौड़ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-33
जुड़्योड़ा विसै