पिया नै किण विध समझाऊं,

नहीं मानै म्हारी बात॥

नणदल बाई बात भिड़ाई मोसा बोली सास।

प्रीतम आतां बात सुणासूं अैड़ी राखी आस।

पिया नै किण विध समझाऊं,

नहीं मानै म्हारी बात॥

प्रीतमजी आतां ही पैलां नणदल भरिया कान।

भोळा-भाळा सायब म्हारा लीवी साची मान।

पिया नै किण विध समझाऊं,

नहीं मानै म्हारी बात॥

रूठ पियाजी खींच खाटलो गया डागळै रात।

झुरती-झुरती रही अकेली मन में रह गई बात।

पिया नै किण विध समझाऊं,

नहीं मानै म्हारी बात॥

बादल सूं म्हैं करी वीणती ऐसा बरसो आज।

डर कर के पिवजी आजावै सुण कर थांरा गाज।

पिया नै किण विध समझाऊं,

नहीं मानै म्हारी बात॥

बिजळी चमकी बादळ गरज्या बरस्या मूसळधार।

उठा खाटलो नीचे आकर खटकायो है द्वार।

पिया नै किण विध समझाऊं,

नहीं मानै म्हारी बात॥

मैं बोली सासूजी नणदल सूता मांय साथ।

राज पधारो ढाल्या मांय उठै बितावो रात।

पिया नै किण विध समझाऊं,

नहीं मानै म्हारी बात॥

‘धीरज' सूं प्रीतमजी बोल्या तिरछी छांटां मांय।

चलो बात पाछली अब तो आडो खोलो आय।

पिया नै किण विध समझाऊं,

नहीं मानै म्हारी बात॥

स्रोत
  • पोथी : शुभगीत ,
  • सिरजक : श्रीनाथ मोदी
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