मन चींत्यां मंगल कद होवै, तिष्णा रो कूप भरै कोनी।

दुरसीस घणी दे कागळियो, बण सै पण ऊंट मरै कोनी॥

खुद की खुद नै करणी पड़सी, पीछाण बावळा जीव तनै।

खुद मर्‌यां मिलैगो सुरग तनै, लोगां सूं काज सरै कोनी‌॥

कांटा रै गैलै मत चालो, चोखो कोनी निन्दा करणो।

थे बैण कहो पण तोल-तोल, बातां रो घाव भरै कोनी‌॥

आदत री सांकळ है पाकी, टूटण रो गेलो भी दोरो।

बळ जावै रस्सी अग्नि सूं, बळ बींको फेर बरै कोनी‌॥

जद रचणहार जळ-थळ-नभ रो हामळ भरणा मै झिझकै तो।

होणी रो घोड़ो कुण म्होड़ै, विधणा रो लेख टरै कोनी‌॥

खारो ही रहसी नीम सदा, गुड़-घी सै सींच्या के होसी।

सूफळ चायै तो जड़ बदळो, वरना तो पार परै कोनी‌॥

सुख चैन दिनां मैं संग सगळा, भीखा मैं आडो आवै कुण।

भाई-भावज, माँ-भैण-पिता, मनड़ै री पीड़ हरै कोनी‌॥

स्वारथ रो हींडो हींडण नै, देवै जण झांसा नुंवा-नुंवा।

बो मिनख घणो ऊंडो डूबै, कोई सूरत उबरै कोनी‌॥

फाट्‌या मैं टांग फंसावण नै, धाना घालै मन बेरीड़ो।

आपां रोकां कद, थप्पी द्यां, खातिर सुधरै कोनी‌॥

डूंगर बळती दीखे सै नै, पग बळती निजर नहीं आवै।

सौ कमी निकाळै लोगां मैं, खुद पै कोई ध्यान धरै कोनी‌॥

जिनगानी जीओ, मुळक-मुळक, रोणां सूं खाटो घालै कुण।

नेकी कर नाख कुआ मैं ‘दिल’ पुन रो परताप मरै कोनी‌॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : ओमप्रकाश लीची ‘दिल’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 26
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