मन का मौजी राम मानखा, जाग्यां पार पड़ैला

चोर पोटळी लेग्या तेरी, भाग्यां पार पड़ैला।

कद तक गफलत की नींदा में

सूत्यो रैसी बेली

तेरै फूस छान पर कोनी

लोग चिणाली हेली

पूण पावलो जोड़ जुगत में, लाग्यां पार पड़ैला

चोर पोटळी लेग्या तेरी, भाग्यां पार पड़ैला।

तूं दे साग रोटड़ी, तूं दे

तूं कुड़ता करवादे

तूं दे तूं दे करै, स्यान क्यूं

तेरी जघां जघां दे

कितनां दिन तक जणै-जणै सूं मांग्यां पार पड़ैला

चोर पोटळी लेग्या तेरी, भाग्यां पार पड़ैला।

सगळी ही ठाला रैता

जे आळस धन करवा दे

मन की मांनै बात मांहीनै

बड़कै मन मरवादे

कांधै धरी दुनाळी मन पर, दाग्यां पार पड़ैला

चोर पोटळी लेग्या तेरी, भाग्यां पार पड़ैला।

बड़का की तूं बात छोड़

बड़का तो पूरी करग्या

बां ही लीकां नै पीटी तो

ही जाणले मरग्या

बखत भारग्यो तेज डोळियां, भाग्यां पार पड़ैला

चोर पोटळी लेग्या तेरी, भाग्यां पार पड़ैला।

स्रोत
  • पोथी : हिवड़ै रो उजास ,
  • सिरजक : भागीरथ सिंह ‘भाग्य’ ,
  • संपादक : श्रीलाल नथमल जोशी ,
  • प्रकाशक : शिक्षा विभाग राजस्थान के लिए उषा पब्लिशिंग हाउस, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै