ये ओरां वाळ फोड़ा,
भगतै कद तांई यो मन!
यो घर छै जंतर-मंतर
गेला गेला में ऊंळ
सूरज कै ओळ्यूं-दोळ्यूं
बदबा लाग्या बम्बूळ।
आतां अर आतां-जातां
कटग्या दन कटगी रातां,
यूं गरणरटेरा खातां
धरती नै आवै भूंळ।
ये बना गांठ गरजोड़ा,
बांध्यां राख कतना दन!
आंगण में रोपी तुळसां
उग आया थापाथूर
मनसा उफणी तो अतनी
जे खड़ी कर्याड़ां पूर।
दुख सूं दुख को ई सांटो,
कतनो ई काटो-छांटो,
अब कळी-कळी में कांटो,
यां बागां को दस्तूर।
दै डाळ-डाळ कठफोड़ा,
पसबा पै चांचस दनादन।