हरिया-भरिया खेतां मांयनै, धान झिकोळा खाय जी

मेड़ां माथै गोरी गमकै, पल्लो उड़-उड़ जाय जी

काजळिया सूं काळी आंख्यां, देख्यां रूप लजाय जी

सावण बरसै झिरमिर करतो, लै’र्‌यो भीज्यां जाय जी।

मदमातो देस अनोखो, धरती किरसाण री

माटी मोत्यां सूं मूंघी, धरती हिन्दूस्थान री।

समदर लौटै पांव पळोटा, माथै केसर भार जी

धन-धन रे, भागीरथ ल्यायो, धरत्यां गंगाधार जी

जमनां जी री धारा बैवै, ज्यूं कंठा में हार जी

विंध्याचळ यूं लागै, जाणै उठियो मां रो प्यार जी।

धरती धरत्यां री राणी, धरमी रा वरदान री

माटी मोत्यां सूं मूंघी, धरती हिन्दूस्थान री।

मरद-मराठा वीर-सिवाजी नै झांसी री राणी रो

दुसमण देख्यो सत रो सागर, जौहर राजपुताणी रो

अकबर देख्यो, साय बहादर, जोर जमीं रा पाणी रो

देख्यो दुरगादास हठीलो, जायोड़ो जोधाणी रो

सूर सपूतां री जामण, जननी भगवान री

माटी मोत्यां सूं मूंघी, धरती हिन्दूस्थान री।

सूरदास नै तुळसी-मीरा, नानक देव कबीरा जी

रामक्रिस्ण रा सिस्य विवेकानंद सदै मति-धीरा जी

नरसैयो जद नाचण लाग्यो, दे-दे ताल मंजीरा जी

बण चैतन्य निमाई निकळ्यो, साथै साध-फकीरा जी

भगतां री भव्य-भारती, भगती रा जस गान री।

माटी मोत्यां सूं मूंघी, धरती हिन्दूस्थान री।

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : जयशिव व्यास श्रीमाली ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : नवम्बर
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