बादळ घिर आयो धरर-धरर

इमरत टपकावै झरर-झरर।

धरती री सूनी गोद भरी

चूनर में जुगनू जड़ी-जड़ी

माथै पर तीज लाल टीकी

अर मांग धनुक सिंदूर भरी

पण बिरहण रो तन चरर-मरर।

लहरियो सो लहरावै बादळ

घूंघट में मुळक झुळक काजळ

फड़कै आंखड़ली फड़क-फड़क

हिचकी आवै खुल मन आगळ

पिरवा सरणावै सरर-सरर।

बादळ कड़कै, मनड़ो भड़कै

बीजळ लपकै, हिवड़ो धड़कै

डाकियै नैं पूण पावलो दे

कागद लिखवा दे सूं तड़कै

रातड़ल्यां काटूं डरर-डरर।

टप-टप, टप-टप, टाप चव

बाबा रो झूंपो आप चवै

कच्चो रंग कुड़ती रो ढळक

आंगी रा कसणा सरम मरै

जद ढुळै जवानी तरर-तरर।

चढ़ मोर्‌यो खेजड़ली बोलै

हिवड़ो उजळै मनड़ो डोलै

बळज्याणो चांद बण्यो बर्छी

बैठ्यो गजबी मैड़ी ओलै

हिवड़ो काटै है करर-करर।

घर खेत कुआ सै हर्‌या भर्‌या

पण सूका थां बिन मर्‌या-मर्‌या

जद देखूं काच उठा, मूंडो

लागै थे सामीं हसो खड़्या

ढोळा ढळकै हैं फिरर-फिरर।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : हरफूलसिंह ‘रसिक’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 11
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