घाव पड़्यो बिवड़ै में ऊंडो, पीड़ पुराणी पड़ै नहीं
भारत सोक-समंदर डूब्यो, बिसवै-लौकी कांप रही
मिनखपणो मुरझायो, धूज्यो, सेवा लारो ले लीनो।
पंचसील नै पूजण हाळै नेहरू गवण कियां कीनो?
सागर सो हो गैरो ग्यानी, गिरवर सिरसो आण-अडिग
चपला जेड़ो चंचळ चैरो, जिग आजादी करणो सिग्ग
लेकिन छोड़ गयो रिण कारण, बात बतादे बेमाता?
विपदा रै भूकम्पै भैळ्या, बीत गई सै सुख साता
ऊभ अेसिया अर अफ्रिका, जोवै जवाहर गयो कठै?
फूट, रूस अमरीका रोवै, गैरी गायड़ नहीं अठै।
राजनीत रुळ गई बापड़ी, काजरीत कुढ-कुढ कळपै।
कोढ़, रोग कानून जा पड़ी, त्याग भाग भरमै, तळपै।
गंगाजळ सी पूत चेतना बैर-भाव जन्तुआं हीण
निकळंकी निसपाप मानखो करग्यो जगती जीणै तीण।
दिग्गज डोळ्या, सेस फुंफायो, होणी आ भचर मंडगी
फूलगुलाबी, पाग दुनी री पेच उधड़ पड़ खिण खिंडगी।
कूकै मोर, जोर सूं सूवा, बिलखा सूरज-चांद वगै
धरती-आभ अलूणा लागै, पसूवां-अंसूवां थाग थिगै।
सरधा सारू माळा पोतां, कोया कवियां कळपावै
खातां-पीतां, सोतां-रोतां नेहरू याद घणो आवै।