चन्न-चन्न बरखा बरसै

बादल घड़ड़-धड़ड़ गरज्या

बिजल्यां चमकी हुयो कड़ाकौ

मरवण रा हिवड़ा धड़क्या

सा'यब बैगा आजाज्यौ

तो पाती पटकाज्यो

सूणों घर अर सूणी म्हूं छूं

काली रात म्हनै-डरावे

बाथ भर्‌यां सोऊं लैर सराणों

थे ढोळा-रे सपना आवै-

म्हनै सैणाणी दे जाता

म्हनै आबा की कह जाता

टपूक-टप म्हारौ मंगरो चूवै

पल्कां रातां कटगी

बाट जोटथाक्या पगळ्या

सूण जगातां जुग-कटगी

रुंकड़ी सूख चली आज्यो

ईंने-सींच हरी करज्यो

बाट न्हाळता-दन ढळजा

तारां गिण-रातां कटगी

पल्कां सूं मोती झडतां

मावस-सू पूणियां होगी

म्हारा सायब आजाज्यो

म्हारी पल्कां सोजाज्यो

सावण गीत लगै फीका

बागां का झूळा झौंटा

सजी सहैल्यां करे मसखर्‌यां

पी-रहगी-कड़वी घूंटां

म्हारा इन्दर आजाज्यो

बाग झूळो घळवाज्यो..

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत अगस्त 2005 ,
  • सिरजक : रशीद अहमद पहाड़ी ,
  • संपादक : ओम पुरोहित ‘कागद’ ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
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