दाब्या-दाब्या न्हं दबै मन में भरी मटैट
दोहा मंडवावै म्हं सूं माथै ऊपर बैठ।
दन में क्यूं आवै थनै अतनी गाढ़ी नींद
कांई करूं म्हूं रात भर सोबा न्हं दे बींद।
कस्या मनाऊं मीत नै हे म्हारा भगवान
गांवडेल म्हूं डावड़ी छैलो चतर सुजान।
जद-जद बांधै सायबा वा पचरंगी पाग
जागै म्हारा डील में सेळी-सेळी आग।
उडै गुलाबी चुनड़ी चालै ठंडी बाळ
मुड़ मुड़ ताकै डाबड़ा टपकी जावै लाळ।
कंगण बणगी मूंदड़ी चूनर होगी तार
अब तो पाछा बावड़ो परदेसी भरतार।
उड़ज्या काळा कागला लेज्या यो सन्देस
जुड़ै न टूटो हीवड़ो पीव गया परदेस।
कड़कै बादळ बीजळी चमकै आधी रात
कांपै बैरण अेकली डरपावै बरसात।