जे खल भग्गा, तो सखी ! मोताहळ सज थाळ।

निज भग्गा, तो नाह रो, साथ सूनो टाळ॥

भावार्थ:- हे सखी! यदि शत्रु भाग गये हो तो मोतियों से थाल सजा ला (जिससे प्राणनाथ की आरती उतारुँगी) और यदि अपने ही लोग भाग चले हों तो पतिदेव का साथ मत बिछुड़ने दे अर्थात् मेरे शीघ्र सती होने की तैयारी कर।

स्रोत
  • पोथी : वीर सतसई ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : नरोत्तमदास स्वामी, नरेन्द्र भानावत, लक्ष्मी कमल ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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