उड़ियो चंदर ओढणो, ब्रह्मदेव दरबार।
लागो शाप विरंच रो, उतरी गंग त्रिपुरार॥
शोभी परणी वर शांतनु, उपन्यो अष्टम जाम।
ब्रह्मचारी पराक्रमी पड़ियो भीष्मस् नाम॥
करी तपस्या आकरी, सरगां मिस सगरोत।
भागीरथ भागीरथी, लाया धरा बहोत॥
खलच खळ खटराग खट, खळळ खापगा खाप।
अघ काटे अगलूण अच, आई आपगा आप॥
कळ-कळ करंत कळनाद, कटवण अघ कटिबद्ध।
कमळनैण करूणा करी, स्वर्धनी सन्निद्ध॥
तिहूं लोक में तीन रूप, स्वर्ग मृत्य पाताळ।
त्रिविध ताप हरण तरण, त्रिस्रोती त्रिकाळ॥
गंगा निसरी गंगसिर, त्राहि त्राहि तब त्रासि।
जहु पीगयो पूर्ण जद, जांघ वही जाह्रवि॥
गंगा गंगोत्री अपनी, आई बह गंगद्वार
विसतरियो निज रूप तद, प्रथपथी पै’ली वार॥
सरगां व्हेती रात दिन, मंद मंद मंदाकीनि।
भव भव रो भागे भरम, मात दरस मतिहीनि॥
पंकज-पाद पावन परम, निशुंभन अध वर नीर।
विष्णु पद सूं विष्णुपदी, निसर्या ऊजळ नीर॥