गिरिवर मोर गहक्किया, तरवर मूंक्या पात।

धणियां धण सालण लगा, वूठैतौ बरसात॥

भावार्थ :- पावस के बरसते ही पर्वतों पर मोर उल्लास में भर उठे। वर्षा से तरुवरों पर नये पत्ते लगने लगे। ऐसे मनभावन समय में विरहणियों को अपने प्रियतम की याद सालने लगी।

स्रोत
  • पोथी : ढोला-मारू रा दूहा ,
  • सिरजक : कवि कल्लोल ,
  • संपादक : रामसिंह, सूर्यकरण, नरोत्तमदास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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