बाबहियउ नइ विरहणी, दुहुवां अेक सहाव।

जब ही बरसइ घण घणउ, तब ही कहइ प्रियाव॥

भावार्थ :- पपीहा और विरहणी दोनों ही का एक स्वभाव है। जब-जब मेघ बरसता है तभी ये दोनों 'पी आव', 'पी आव' पुकारते हैं।

स्रोत
  • पोथी : ढोला-मारू रा दूहा ,
  • सिरजक : कवि कल्लोल ,
  • संपादक : रामसिंह, सूर्यकरण, नरोत्तमदास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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