पंथी हाथ संदेसड़इ, धण बिललंती देह।

पगसूं काढइ लीहटी, उर आंसुआं भरेह॥

भावार्थ :- मारवणी विलाप करती हुई पथिक के हाथ सँदेशा देती है, पैर से (पृथ्वी पर) रेखा खींचती है और अपना हृदय आँसुओ से भर लेती है।

स्रोत
  • पोथी : ढोला-मारू रा दूहा ,
  • सिरजक : कवि कल्लोल ,
  • संपादक : रामसिंह, सूर्यकरण, नरोत्तमदास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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