केइ भेष धार्‌यां रा घट मझे, जीव अजीव री खबर कांय।

ते पिण गोळा फेंके गाळां तणा, ते पिण सुध दीसे कांय॥

नव पदार्थ रो त्यांरे निरणों नहीं, दरबां रो निरणों नांय।

न्याय निरणा बिनां बक बोकरे, तिणरो सोच नहीं मन मांय॥

जीव अजीव दोनू जिण कह्‌या, तीजी वस्त काय।

जे जे वस्त छे लोक में, ते दोयां में सर्व समाय॥

नव ही पदार्थ जिण कह्‌या, त्यांनें दोयां में घाले नांय।

त्यांरे अंधकार घट में घणों, ते भूल गया भर्म मांय॥

उंधी उंधी करे छे परूपणा, ते भोला ने खबर कांय।

तिण सू नव पदार्थ रो निरणो कहू, ते सुणजो चित्त ल्याय॥

स्रोत
  • पोथी : भिक्षु ग्रंथ रत्नाकर भाग 1 ,
  • सिरजक : आचार्य भिक्षु ,
  • संपादक : आचार्य तुलसी, श्रीचंद रामपुरिया ,
  • प्रकाशक : जैन श्वेताम्बर् तेरापंथी महासभा, कलकत्ता ,
  • संस्करण : प्रथम
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