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जैन साहित्य पर दूहा
काव्य खंड
दूहा
सोरठा
सबद
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छंद बेअक्खरी
कवित्त
चौपाई
छप्पय
रास
दूहा
20
आश्व दुवार तों छें जीव रा
आचार्य भिक्षु
आश्व तों निश्चेंइ जीव छें
आचार्य भिक्षु
आश्व पदार्थ पांचमों तिणनें
आचार्य भिक्षु
हिवें पाप आवाना बारणा
आचार्य भिक्षु
जीव खोटा खोटा किरतब करें
आचार्य भिक्षु
पाप तो पुदगल द्रव्य छें
आचार्य भिक्षु
केइ मूढ मिथ्याती जीवड़ा
आचार्य भिक्षु
द्रव्य तो असंख्यात प्रदेसी
आचार्य भिक्षु
ए च्यारूं भला ने भुंडा होय
आचार्य भिक्षु
केइ भेष धार्यां रा घट मझे
आचार्य भिक्षु
ते पाप उदें दुख उपजें
आचार्य भिक्षु
कर्म उदें सुं उदें भाव होय
आचार्य भिक्षु
पाप कर्म नें करणी पाप री
आचार्य भिक्षु
द्रव्य रा भाव अनेक छे ताहि
आचार्य भिक्षु
जीव परिणमें जिण जिण भाव मांहि
आचार्य भिक्षु
द्रव्य असंख्यात प्रदेसी जीव
आचार्य भिक्षु
कर्म खय सुं खायक भाव होय
आचार्य भिक्षु
दूहा
संत यशोधर
पाप पदारथ पाडूवों
आचार्य भिक्षु
खंडायो पिण न खंडे लिगार
आचार्य भिक्षु