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अध्यात्म पर दूहा
सबद
दूहा
पद
काव्य खंड
छंद
कविता
दूहा
23
जे डंक लागें सर्प का
बखना जी
जिहि अग्नि न धूवां नीसरै
बखना जी
जीव परिणमें जिण जिण भाव मांहि
आचार्य भिक्षु
कर्म खय सुं खायक भाव होय
आचार्य भिक्षु
सुणि जै ऊंडो गाजतौ
बखना जी
भरिया होई तौ कदेन डोलै
बखना जी
कौसा चौसर लैंणनैं
बखना जी
इहिं ओषधतै साध सब
बखना जी
तिरि तेरू थाके सबै
बखना जी
सांकलि जङ्यो न सीलकै
बखना जी
दूध मिल्यौ ज्यूं नीर मैं
बखना जी
डूंढा बालण वन दहण
बखना जी
आया प्रेम कहां गया
बखना जी
कौडी रमंता डावङौ
बखना जी
ए च्यारूं भला ने भुंडा होय
आचार्य भिक्षु
केइ भेष धार्यां रा घट मझे
आचार्य भिक्षु
पछि पांणी राखै नही
बखना जी
मांही रहै माहैं चरै
बखना जी
सत जत सांच खिमा दया
बखना जी
कीङी कुंजर सूं लङै
बखना जी
मन पवन अरु सुरति थिर
बखना जी
भर्या न फूटै चिणगन छूटै
बखना जी
‘बखना’ मन मैलो रह्यो
बखना जी