सरवर ‘गडमल’ सोहणौ, भर्यौ हबोळा खाय।
नैणां निरखत ना थकै, हिवड़ौ हद हरखाय॥
घाट-घाट घड़ल्या भरै, पाणी री पणिहार।
पंछी बैठ्या पाळ पै, गावै राग मल्हार॥
तट-तट बड़ पीपळ बड़ा, खड़्या नीम अर बोर।
इण विरखां री छांहड़ी, मधरा बोलै मोर॥
सरब सुहागण गोरियां, ओढ सुरंगा चीर।
जळ-झारा माथै लियां, निरखै निरमळ नीर॥
परछाई पणिहार री, लहरां में लहराय।
कंचण कांमण निरखतां, कमल कळी सरमाय॥
मुख उषा मुस्कावती, अधरां सांझी लाल।
पळकै आभा बीजळी, पणिहारी रौ भाल॥
सुंदर, सरस, सरूपणी, सज सोळै सिणगार।
चंद्रवदन मृगलोचणी, मूमल रै उणियार॥
नथड़ी सोवै नाक में, लटकण लटकै फूल।
रस रा लोभी भंवरिया, मारग जावै भूल॥
पलक मूंद पिव नै लखै, कद आवैला मीत।
निरख-निरख मग थाकगी, बरस गया है बीत॥
सांवण छोटी तीज रौ, मेळौ भर्यौ अपार।
पीव मिळण रै परब में, गोर्यां करै विहार
माथै फेंटा मोठड़ा, कंठै सोवै हीर।
धोबा भर-भर पीवता, सूरा गडमल नीर॥
काळ कटै, रोज'ज घटै, हट जावै सै पीर।
सीतळ सुखद गंगा जिसौ, ‘गडमलियै’ रौ नीर॥