राति सखी इण ताल मइं, काइ कुरळी पंखि।

उवै सरि हूं घरि आपणइ, बिहूं मेळी अंखि॥

भावार्थ :- हे सखि! रात को इस सरोवर में किसी पक्षी ने कलरव किया। वह अपने सरोवर में और मैं घर में–हम दोनों की ही आँख नहीं लगी।

स्रोत
  • पोथी : ढोला-मारू रा दूहा ,
  • सिरजक : कवि कल्लोल ,
  • संपादक : रामसिंह, सूर्यकरण, नरोत्तमदास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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