इहां सु पंजर मन उहां, जय जाणइला लोइ।

नयणा आडा वींझ वन, मनह आडउ कोइ॥

भावार्थ :- मेरा देह पिंजर तो यहाँ है और मन वहाँ है। वास्तव में यदि लोग समझें तो यद्यपि आँखों के अवरोधी घने जंगल हैं पर मन का अवरोधी कोई नहीं।

स्रोत
  • पोथी : ढोला-मारू रा दूहा ,
  • सिरजक : कवि कल्लोल ,
  • संपादक : रामसिंह, सूर्यकरण, नरोत्तमदास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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