इहां सु पंजर मन उहां, जय जाणइला लोइ।
नयणा आडा वींझ वन, मनह न आडउ कोइ॥
भावार्थ :- मेरा देह पिंजर तो यहाँ है और मन वहाँ है। वास्तव में यदि लोग समझें तो यद्यपि आँखों के अवरोधी घने जंगल हैं पर मन का अवरोधी कोई नहीं।