ढोला आमण दूमणउ, नख ती खूदइ भीति।

हमथी कुण छइ आगळी, वसी तुहारइ चीति॥

भावार्थ:- हे ढोला! तुम उदास हो रहे हो, नखों से भींत खरोंच रहे हो। हमसे बढ़कर कौन है जो तुम्हारे चित में बसी है?

स्रोत
  • पोथी : ढोला-मारू रा दूहा ,
  • सिरजक : कवि कल्लोल ,
  • संपादक : रामसिंह, सूर्यकरण, नरोत्तमदास ,
  • प्रकाशक : नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ,
  • संस्करण : तृतीय
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